इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक पारिवारिक विवाद की सुनवाई के दौरान बेहद महत्वपूर्ण टिप्पणी की है। कोर्ट ने कहा है कि एक पिता को यह जानने का पूरा अधिकार है कि वह संतान का जैविक पिता (Biological Father) है या नहीं, और इसी तरह एक बेटी को भी अपने असली पिता के बारे में जानने का मौलिक अधिकार है।
क्या है पूरा मामला?
यह मामला सोनभद्र के जवाहर लाल जायसवाल और उनकी पत्नी के बीच चल रहे भरण-पोषण (Maintenance) विवाद से जुड़ा है।
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मार्च 2025 में सोनभद्र की फैमिली कोर्ट ने पति को अपनी नाबालिग बेटी के लिए ₹6,000 प्रति माह गुजारा भत्ता देने का आदेश दिया था।
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पति ने अपनी दलील में कहा था कि वह और उसकी पत्नी साल 2000 से अलग रह रहे हैं और वह इस बच्ची का जैविक पिता नहीं है।
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पति ने DNA टेस्ट की मांग की थी, जिसे फैमिली कोर्ट ने खारिज कर दिया था। इसके खिलाफ पति ने हाईकोर्ट में याचिका दायर की।
हाईकोर्ट की अहम टिप्पणी
न्यायमूर्ति मदन पाल सिंह की पीठ ने निचली अदालत के फैसले को रद्द करते हुए कहा कि पिता और पुत्री के बीच जैविक संबंध है या नहीं, यह स्पष्ट होना समाज में गरिमापूर्ण जीवन जीने के लिए आवश्यक है। कोर्ट ने कहा, “यदि यह स्पष्ट नहीं होता है, तो यह संदेह जीवन भर दोनों को परेशान करेगा।”
मानवाधिकार और मेंटेनेंस
कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि भरण-पोषण का अधिकार केवल कानूनी प्रावधान नहीं है, बल्कि यह बुनियादी मानवाधिकारों से जुड़ा है। हालांकि, पितृत्व (Paternity) पर उठे गंभीर विवाद को सुलझाने के लिए DNA टेस्ट एक सटीक और वैज्ञानिक रास्ता है।
कोर्ट का निर्देश
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट को निर्देश दिया है कि वह DNA टेस्ट करवाकर पितृत्व की पुष्टि करे और उसके आधार पर भरण-पोषण के मामले में तीन महीने के भीतर नया और तर्कसंगत आदेश पारित करे।
