भारत, जो दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने का दावा करता है, आज एक ऐसी स्थिति में खड़ा है जहाँ उसे अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए वाशिंगटन की ‘इजाजत’ का इंतजार करना पड़ रहा है। हाल ही में अमेरिका द्वारा दी गई 30 दिनों की ‘टेंपरेरी छूट’ न केवल भारत की विदेश नीति पर सवाल उठाती है, बल्कि यह भी बताती है कि हम अपनी ऊर्जा सुरक्षा के मामले में कितने मजबूर हो चुके हैं।
1. ‘इजाजत’ का अपमान: क्या हम अब भी स्वतंत्र हैं?
यह अत्यंत शर्मनाक है कि भारत को यह बताया जा रहा है कि वह किससे और कब तक तेल खरीद सकता है।
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अमेरिकी दबाव: ट्रंप प्रशासन द्वारा भारतीय निर्यात पर 25% दंडात्मक शुल्क लगाने की धमकी के बाद भारत ने रूसी तेल के आयात में भारी कटौती की (जो कुल आयात का 35% से गिरकर 20% से कम रह गया)।
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ब्लैकमेल की राजनीति: अब जब मध्य-पूर्व (ईरान संकट) के कारण वैश्विक तेल की आपूर्ति बाधित हुई है, तो अमेरिका ने ‘दानवीर’ बनकर 30 दिनों की मोहलत दी है। विपक्ष इसे “अमेरिकन ब्लैकमेल” करार दे रहा है, क्योंकि यह छूट केवल उन्हीं जहाजों के लिए है जो 5 मार्च 2026 तक लोड हो चुके थे। क्या एक संप्रभु राष्ट्र की नीतियां बाहरी देशों के ‘वेंडर लाइसेंस’ पर चलेंगी?
2. तेल रिज़र्व (SPR): वर्षों की सुस्ती का नतीजा
आपकी यह बात तकनीकी रूप से सही है कि भारत का स्ट्रैटेजिक पेट्रोलियम रिज़र्व (SPR) अभी भी उस स्तर पर नहीं है जहाँ उसे होना चाहिए था।
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आंकड़ों का खेल: सरकार का दावा है कि हमारे पास 7-8 सप्ताह (लगभग 50-55 दिन) का कुल स्टॉक है। लेकिन इसमें से स्ट्रैटेजिक रिज़र्व (भूमिगत गुफाओं में) केवल 9.5 दिनों की जरूरत पूरी कर सकता है। बाकी तेल कंपनियों के टैंकों और पाइपलाइनों में है।
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रुकी हुई प्रगति: पिछले 10 वर्षों में ‘फेज-2’ (चंडीखोल और पाडुर विस्तार) पर काम की गति बहुत धीमी रही है। यदि भारत के पास कम से कम 90 दिनों का स्वतंत्र स्ट्रैटेजिक रिज़र्व होता, तो आज हमें अमेरिका की शर्तों के आगे झुकने की जरूरत नहीं पड़ती।
3. ‘मित्रता’ की कीमत और डबल्स स्टैंडर्ड्स
अमेरिका एक तरफ भारत को ‘अपरिहार्य साझेदार’ कहता है, और दूसरी तरफ अपनी नीतियों के जरिए भारत की अर्थव्यवस्था को नियंत्रित करने की कोशिश करता है।
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दोहरा मापदंड: जब यूरोप रूस से गैस खरीदता है, तो वह “मजबूरी” होती है, लेकिन जब भारत अपनी 140 करोड़ जनता के लिए सस्ता तेल खोजता है, तो उसे “प्रतिबंधों” की धमकी दी जाती है।
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कीमत का बोझ: घरेलू बाजार में LPG की कीमतों में 7% की हालिया बढ़ोतरी और पेट्रोल-डीजल की अस्थिरता यह दर्शाती है कि सरकार की ‘सस्ते रूसी तेल’ वाली कूटनीति अब अमेरिकी दबाव में बिखर रही है।
निष्कर्ष: सरकार को आत्ममंथन की जरूरत
एक मजबूत राष्ट्र वह होता है जिसकी ऊर्जा नीतियां उसके अपने हितों से तय होती हैं, न कि किसी दूसरे देश के ‘ट्रेजरी विभाग’ के ट्वीट से। सरकार को केवल “इवेंट मैनेजमेंट” और “द्विपक्षीय दौरों” तक सीमित रहने के बजाय, ऊर्जा आत्मनिर्भरता और स्ट्रैटेजिक रिज़र्व को युद्ध स्तर पर बढ़ाने की जरूरत है।
बड़ा सवाल: क्या हम वास्तव में एक ‘विश्वगुरु’ या उभरती शक्ति हैं, अगर हमारे चूल्हों की आग बुझने का डर वाशिंगटन के एक दस्तखत पर टिका है?
