नई दिल्ली, 16 फरवरी।
पहलगाम आतंकी हमले के पीड़ित परिवारों को राहत और पुनर्वास के लिए किए गए वादों के बावजूद, कई परिवार अब भी इंतजार में हैं। महाराष्ट्र की असावरी जगदाले, जिनके पिता की इस हमले में मृत्यु हुई थी, पिछले 10 महीनों से सरकारी नौकरी के वादे के पूरा होने का इंतजार कर रही हैं।
असावरी के पिता संतोष जगदाले उन 26 लोगों में शामिल थे, जिनकी 22 अप्रैल को पहलगाम के बैसरन मैदान में आतंकियों द्वारा की गई गोलीबारी में मौत हो गई थी। इस घटना के बाद महाराष्ट्र सरकार ने पीड़ित परिवारों को 50 लाख रुपये की आर्थिक सहायता देने के साथ-साथ परिजनों को सरकारी नौकरी देने की घोषणा की थी।
वादे और हकीकत के बीच फंसा परिवार
घटना के बाद आर्थिक सहायता तो दी गई, लेकिन रोजगार का वादा अब तक अधूरा है। असावरी का कहना है कि उन्हें नौकरी देने का आश्वासन मिला था, लेकिन 10 महीने बीत जाने के बाद भी इस दिशा में कोई ठोस प्रगति नहीं हुई है।
उन्होंने बताया कि इस संबंध में उन्होंने कई बार संबंधित अधिकारियों और सरकार से संपर्क करने की कोशिश की, लेकिन हर बार उन्हें केवल आश्वासन ही मिला कि प्रक्रिया जारी है।
आर्थिक संकट से जूझता परिवार
पिता की मृत्यु के बाद परिवार को आर्थिक कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है। असावरी के अनुसार, परिवार अब अपनी बचत के सहारे गुजर-बसर कर रहा है। ऐसे में सरकारी नौकरी का वादा उनके लिए केवल रोजगार ही नहीं, बल्कि स्थिरता और सुरक्षा का भी प्रतीक है।
राजनीतिक स्तर पर उठाया गया मुद्दा
इस मामले को लेकर राजनीतिक स्तर पर भी हलचल देखने को मिली है। असावरी ने राज्य के उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे और मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस के कार्यालयों से संपर्क किया है। इसके अलावा, राज्यसभा सांसद मेधा कुलकर्णी ने भी इस मुद्दे को केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के समक्ष उठाया है।
वहीं, भारतीय जनता पार्टी के नेताओं ने आश्वासन दिया है कि इस मामले को गंभीरता से लिया जा रहा है और जल्द ही समाधान निकालने की कोशिश की जाएगी।
प्रशासनिक प्रक्रिया या देरी?
अधिकारियों की ओर से बताया जा रहा है कि मामला प्रक्रिया में है और इस पर काम चल रहा है। हालांकि, पीड़ित परिवारों का कहना है कि लंबे समय तक केवल प्रक्रिया का हवाला देना उनके लिए संतोषजनक नहीं है।
संवेदनशील मामलों में त्वरित कार्रवाई की जरूरत
आतंकी हमलों के पीड़ित परिवारों के लिए सरकारी सहायता केवल आर्थिक मदद तक सीमित नहीं होती, बल्कि इसमें सम्मानजनक पुनर्वास और स्थायी रोजगार भी शामिल होता है। ऐसे में वादों के क्रियान्वयन में देरी से न केवल प्रभावित परिवारों की उम्मीदें टूटती हैं, बल्कि सरकारी तंत्र की संवेदनशीलता पर भी सवाल खड़े होते हैं।
पहलगाम हमले के पीड़ितों के लिए की गई घोषणाओं को समयबद्ध तरीके से लागू करना जरूरी है, ताकि प्रभावित परिवारों को न्याय और सहारा मिल सके। असावरी जगदाले का मामला इस बात की याद दिलाता है कि राहत के वादों को धरातल पर उतारना उतना ही महत्वपूर्ण है जितना उनका किया जाना।
