विशेष रिपोर्ट: न्यूज़ ड्रिफ्ट ब्यूरो
देश की सबसे महत्वाकांक्षी अवसंरचनात्मक परियोजनाओं में से एक, ग्रेट निकोबार मेगा इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजना को राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) से हरी झंडी मिल गई है। लगभग 80,000 करोड़ रुपये की लागत वाली इस परियोजना को रणनीतिक और आर्थिक दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। हालांकि, इसके पर्यावरणीय प्रभावों को लेकर चर्चा और चिंताएं भी बनी हुई हैं।
एनजीटी की छह सदस्यीय विशेष पीठ ने परियोजना से जुड़ी विभिन्न याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए पाया कि इसमें हस्तक्षेप करने का कोई ठोस आधार नहीं है। पीठ ने माना कि परियोजना की पर्यावरणीय स्वीकृति के दौरान आवश्यक सुरक्षा उपायों को ध्यान में रखा गया है और समग्र तथा रणनीतिक महत्व को देखते हुए इसे आगे बढ़ाने की अनुमति दी जा सकती है।
ग्रेट निकोबार द्वीप के बारे में :-
अंडमान और निकोबार द्वीपसमूह में कुल 836 द्वीप शामिल हैं, जिन्हें टेन डिग्री चैनल द्वारा अंडमान (उत्तर) और निकोबार (दक्षिण) में विभाजित किया गया है। ग्रेट निकोबार निकोबार का सबसे बड़ा द्वीप है (910 वर्ग किलोमीटर वर्षावन क्षेत्र)। इसमें इंदिरा प्वाइंट स्थित है, जो भारत का सबसे दक्षिणी छोर है और सुमात्रा (इंडोनेशिया) से मात्र 90 समुद्री मील दूर है।
ग्रेट निकोबार में दो राष्ट्रीय उद्यान, एक बायोस्फीयर रिज़र्व, शोंपेन और निकोबार जनजातीय समुदायों की छोटी आबादी तथा कुछ हज़ार गैर-जनजातीय निवासी हैं।
ग्रेट निकोबार बायोस्फीयर रिज़र्व को वर्ष 2013 में UNESCO के मानव और जैवमंडल (MAB) कार्यक्रम की सूची में शामिल किया गया था।
परियोजना का स्वरूप और महत्व
ग्रेट निकोबार द्वीप, जो निकोबार द्वीप समूह का सबसे बड़ा और दक्षिणतम हिस्सा है, लगभग 910 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैला हुआ है। यह क्षेत्र जैव-विविधता से भरपूर और अपेक्षाकृत कम आबादी वाला है। प्रस्तावित परियोजना में एक अंतरराष्ट्रीय कंटेनर ट्रांसशिपमेंट टर्मिनल, एक ग्रीनफील्ड अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा, टाउनशिप विकास और एक गैस आधारित पावर प्लांट शामिल हैं।
सरकार के अनुसार, यह परियोजना भारत को वैश्विक समुद्री व्यापार में एक मजबूत स्थिति दिला सकती है। वर्तमान में भारत को कई मामलों में सिंगापुर और कोलंबो जैसे विदेशी बंदरगाहों पर निर्भर रहना पड़ता है। इस परियोजना के माध्यम से इस निर्भरता को कम करने की कोशिश की जा रही है।
सामरिक महत्व’ बनाम ‘पारिस्थितिक सुरक्षा’
NGT की विशेष पीठ ने अपने फैसले में ‘सामरिक महत्व’ को सर्वोपरि रखा है। इसमें कोई दो राय नहीं कि मलक्का जलडमरूमध्य के पास स्थित यह द्वीप भारत के लिए समुद्री सुरक्षा और चीन की घेराबंदी के लिहाज से बेहद अहम है। लेकिन सवाल यह है कि क्या राष्ट्रीय सुरक्षा की परिभाषा में हमारे जंगलों, दुर्लभ जनजातियों और लुप्तप्राय प्रजातियों की सुरक्षा शामिल नहीं है?
8.5 लाख से लेकर 10 लाख (कुछ अनुमानों के अनुसार इससे भी कहीं अधिक) पेड़ों की कटाई को महज ‘विकास की कीमत’ मान लेना एक भयावह भूल साबित हो सकती है। 130 वर्ग किलोमीटर के प्राचीन उष्णकटिबंधीय वर्षावन को काटकर वहां कंक्रीट का जंगल खड़ा करना उस जैव-विविधता का अंत है जिसे दोबारा कभी बनाया नहीं जा सकेगा।
विसंगतियों का जाल: तथ्यों के आइने में
NGT का कहना है कि परियोजना में ‘उचित सुरक्षा उपाय’ लागू हैं, लेकिन पर्यावरण कार्यकर्ताओं की आपत्तियां इन दावों की पोल खोलती हैं:
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हरियाणा में प्रतिपूरक वनीकरण: निकोबार के सदाबहार वर्षावनों की कटाई की भरपाई हरियाणा या मध्य प्रदेश में पेड़ लगाकर कैसे की जा सकती है? क्या मैदानी इलाकों का वनीकरण उस जटिल इकोसिस्टम का विकल्प हो सकता है जहाँ ‘निकोबार मेगापोड’ और ‘लेदरबैक कछुए’ जैसे जीव रहते हैं?
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तटवर्ती नियमों की अनदेखी: याचिकाकर्ता आशीष कोठारी ने स्पष्ट रूप से रेखांकित किया है कि परियोजना का एक बड़ा हिस्सा (700 हेक्टेयर से अधिक) ‘द्वीप तटीय विनियमन क्षेत्र’ (ICRZ) के नियमों का उल्लंघन करता है। बंदरगाह और हवाई अड्डे के लिए उन क्षेत्रों को चुना गया है जो कछुओं के प्रजनन और मूंगा चट्टानों (Coral Reefs) के लिए संवेदनशील हैं।
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भूकंपीय खतरा: ग्रेट निकोबार उसी फॉल्ट लाइन पर स्थित है जिसने 2004 में विनाशकारी सुनामी का सामना किया था। क्या 80 हजार करोड़ का निवेश इस आपदा संभावित क्षेत्र में सुरक्षित है? ईआईए (EIA) रिपोर्ट में इस खतरे को कम करके आंकने के आरोप सरकार की मंशा पर सवाल खड़े करते हैं।
जनजातियों का अस्तित्व दांव पर
परियोजना का सबसे काला पहलू ‘शोंपेन’ और ‘निकोबारी’ जनजातियों पर पड़ने वाला प्रभाव है। विकास के इस शोर में उन लोगों की सहमति और उनके अधिकारों को हाशिए पर धकेल दिया गया है जिनकी पीढ़ियां इन जंगलों की रक्षा करती आई हैं।
एनजीटी का रुख
एनजीटी ने अपने निर्णय में कहा कि पर्यावरणीय स्वीकृति प्रक्रिया के दौरान आवश्यक शर्तों और सुरक्षा उपायों को शामिल किया गया है। साथ ही, यह भी कहा गया कि परियोजना के समग्र लाभ और राष्ट्रीय महत्व को देखते हुए इसे रोका नहीं जा सकता। हालांकि, अधिकरण ने यह भी संकेत दिया कि संबंधित एजेंसियों को पर्यावरणीय मानकों का सख्ती से पालन करना होगा।
संतुलन की चुनौती
ग्रेट निकोबार परियोजना भारत के विकास और रणनीतिक हितों के लिए महत्वपूर्ण कदम मानी जा रही है, लेकिन इसके साथ ही यह एक बड़ी चुनौती भी प्रस्तुत करती है—विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन बनाए रखना।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि परियोजना को पर्यावरणीय मानकों का पालन करते हुए सावधानीपूर्वक लागू किया जाता है, तो इसके नकारात्मक प्रभावों को कम किया जा सकता है। इसके लिए निरंतर निगरानी, पारदर्शिता और स्थानीय पारिस्थितिकी के प्रति संवेदनशील दृष्टिकोण आवश्यक होगा।
