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    Home»खबर विशेष»अरावली: परिभाषा के फेर में प्रकृति
    अरावली: परिभाषा के फेर में प्रकृति

    अरावली: परिभाषा के फेर में प्रकृति

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    By News Drift on January 30, 2026 खबर विशेष
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    लेखक – रवि कान्त त्रिपाठी

    भारत की सबसे प्राचीन पर्वतमालाओं में से एक अरावली पर्वतमाला आज अपने अस्तित्व की सबसे गंभीर चुनौती का सामना कर रही है। राजस्थान, हरियाणा, दिल्ली और गुजरात तक फैली यह श्रृंखला केवल भूगोल का हिस्सा नहीं, बल्कि उत्तर भारत की जल–पर्यावरणीय सुरक्षा कवच रही है। विडंबना यह है कि “विकास” के नाम पर यही अरावली आज भविष्य की बलि चढ़ाई जा रही है।

     

    अरावली का इतिहास

    अरावली पर्वतमाला विश्व की सबसे प्राचीन पर्वतमालाओं में से एक मानी जाती है। भूवैज्ञानिक अध्ययनों के अनुसार इसकी उत्पत्ति लगभग 2.5 से 3 अरब वर्ष पूर्व प्रीकैम्ब्रियन युग में हुई थी। यह पर्वतमाला गुजरात से लेकर राजस्थान, हरियाणा और दिल्ली तक लगभग 800 किलोमीटर में फैली हुई है।

     

    क्या है मामला: 

    केंद्र सरकार द्वारा 13 अक्टूबर 2025  को प्रस्तावित और सर्वोच्च न्यायालय द्वारा 20 नवंबर 2025 को स्वीकार की गई अरावली पर्वतमाला की नई परिभाषा, भारतीय वन सर्वेक्षण के एक आंतरिक आकलन के अनुसार, खनन और अन्य विकास गतिविधियों से सुरक्षा के दायरे से लगभग 90% हिस्से को प्रभावी रूप से बाहर कर देती है।

    आलोचकों को आशंका है कि नई परिभाषा पहले से ही खराब हो चुकी इस पर्वत श्रृंखला के लिए एक बड़ा झटका साबित होगी, जो उत्तरी और उत्तर-पश्चिमी भारत को विविध पारिस्थितिक और पर्यावरणीय सेवाएं प्रदान करती है।

     

    क्या है नयी परिभाषा: 

    केंद्र सरकार की सिफारिशों के बाद न्यायालय द्वारा स्वीकृत नई परिभाषा के अनुसार, अरावली पर्वतमाला वह भू-आकृति है जो आसपास के भूभाग से कम से कम 100 मीटर (328 फीट) ऊपर उठती है। साथ ही ऐसी दो या अधिक अरावली पहाड़ियों का समूह, जो एक-दूसरे से 500 मीटर के दायरे में स्थित हों उसे अरावली पर्वतमाला कहा जाएगा।  उदाहरण के लिए अगर प्वाइंट A पर कोई पहाड़ है और उसकी ऊंचाई 100 मीटर से ज़्यादा है तो ऐसे मामले में उस पहाड़ के 500 मीटर के दायरे को अरावली रेंज मान लिया जाएगा और वहां किसी भी प्रकार के खनन की इजाज़त नहीं दी जाएगी।  इसके अलावा अगर प्वाइंट A से कुछ दूर एक और पहाड़ की ऊंचाई 100 मीटर से ज़्यादा है तो उसके भी 500 मीटर के दायरे को अरावली रेंज में गिना जाएगा और वहां इस पूरे इलाके में खनन को रोकना सरकार का काम होगा।  

     

    लोगो की नाराजगी की वजह:  

    सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद  बहुत सारे लोग और खासकर पर्यावरणविद इससे नाराज़ हो गए और उनका कहना ये है कि इस नई परिभाषा के कारण बहुत सारे अरावली के पहाड़ों को पहाड़ ही नहीं माना जाएगा और अरावली रेंज में बेहिसाब खनन शुरू हो जाएगा। इनका मानना है कि यह नई परिभाषा अरावली के 90 प्रतिशत पहाड़ों को ख़त्म करने के संकट में डाल देगी।  

    अक्टूबर 2024 में भारतीय वन सर्वेक्षण की एक रिपोर्ट आई थी, जिसमें ये बताया गया था कि राजस्थान के कुल 15 ज़िलों में अरावली के 12081 पहाड़ हैं, जिसमें से सिर्फ 1048 यानी 8.7 प्रतिशत पहाड़ ही ऐसे हैं, जिनकी ऊंचाई 100 मीटर से ज़्यादा है।  इसका मतलब ये हुआ कि अकेले राजस्थान में अरावली के 90 प्रतिशत से ज़्यादा पहाड़ों की ऊंचाई 100 मीटर से कम है और अब नई परिभाषा के कारण ये सारे पहाड़ खतरे में आ सकते हैं।  

     

    इसी बात को देखते हुए फॉरेस्ट सर्वे ऑफ इंडिया ने पिछले साल अपनी रिपोर्ट में एक सुझाव दिया था और वो सुझाव ये था कि 100 मीटर की जगह 30 मीटर या उसके बराबर ऐसे छोटे-छोटे पहाड़ों पर खनन की इजाजत नहीं होनी चाहिए, जिनकी ढलान 4.57 डिग्री या उससे ज़्यादा हो। अब इस सुझाव में तो 30 मीटर ऊंचे अरावली पहाड़ों को पहाड़ मानने की बात कही गई थी लेकिन केन्द्रीय पर्यावरण मंत्रालय की सिफारिशों में इसे 100 मीटर कर दिया गया और आज इसी को लेकर विवाद हो रहा है।  

     

    अरावली का पर्यावरणीय और भौगोलिक महत्त्व

    जलवायु संतुलन में भूमिका

    अरावली पर्वतमाला थार मरुस्थल को पूर्व की ओर बढ़ने से रोकने में प्राकृतिक अवरोध का कार्य करती है। यह मानसूनी हवाओं की दिशा और वर्षा-वितरण को प्रभावित कर उत्तर भारत के जलवायु संतुलन को बनाए रखती है।

    जल संरक्षण और भूजल पुनर्भरण

    अरावली क्षेत्र वर्षा जल को संचित कर भूजल पुनर्भरण में मदद करता है। हरियाणा, राजस्थान और दिल्ली के कई इलाके अपनी जल सुरक्षा के लिए अरावली पर निर्भर रहे हैं।

    जैव विविधता का केंद्र

    अरावली वन क्षेत्र अनेक वनस्पति और जीव-जंतुओं का आवास है – जैसे तेंदुआ, सियार, नीलगाय, सर्प और औषधीय पौधे। यह पर्वतमाला उत्तर भारत की जैव विविधता की रीढ़ मानी जाती है।

    मृदा संरक्षण और कृषि

    अरावली ढलानों द्वारा मृदा अपरदन को रोकने में सहायता मिलती है, जिससे आसपास के मैदानी क्षेत्रों की कृषि भूमि सुरक्षित रहती है।

    सांस्कृतिक और ऐतिहासिक महत्त्व

    अरावली ने राजपूत स्थापत्य, दुर्गों (जैसे कुम्भलगढ़ क्षेत्र) और व्यापार मार्गों को संरक्षण दिया। यह केवल प्राकृतिक संरचना नहीं, बल्कि भारतीय सांस्कृतिक इतिहास का भी अहम हिस्सा है।

     

    केंद्र सरकार का तर्क

    केन्द्र सरकार का कहना है कि नयी परिभाषा से 90 प्रतिशत पहाड़ हमेशा के लिए संरक्षित और सुरक्षित हो जाएंगे, और उन्हें कोई नहीं छू पाएगा। असल में सरकार की दलील ये है कि सुप्रीम कोर्ट के फैसले को अब तक गलत समझा गया है, बहुत सारे लोग ये सोच रहे हैं कि जो पहाड़ 100 मीटर ऊंचे नहीं होंगे, उन्हें पहाड़ नहीं माना जाएगा,  जबकि ये सच नहीं है।  

    सरकार का कहना है कि 100 मीटर की ऊंचाई सिर्फ पहाड़ों की पहचान के लिए रखी गई है और असली परिभाषा ये है कि अगर कोई पहाड़ 100 मीटर से ऊंचा है तो उसके आसपास 500 मीटर के इलाके को अपने आप संरक्षित मान लिया जाएगा। इसके अलावा अगर इस 500 मीटर के इलाके में एक और पहाड़ आता है और उसकी ऊंचाई भी 100 मीटर से अधिक होती है तो उसके भी 500 मीटर के इलाके को अरावली रेंज माना जाएगा और इस तरह जो छोटे पहाड़ हैं और जिनकी ऊंचाई 100 मीटर से कम है, वो अपने आप बड़े पहाड़ों के दायरे में आने से संरक्षित हो जाएंगे।  

    हालांकि सरकार के इस स्पष्टीकरण के बाद भी बड़ा सवाल यही है कि जब अरावली के पहाड़ों में ज़्यादातर पहाड़ों की ऊंचाई 100 मीटर से कम है तो ऐसे में ये कैसे स्पष्ट होगा कि कौन से पहाड़ पहाड़ रहेंगे और कौन से पहाड़ खनन के हवाले कर दिए जाएंगे।  

     

    जनाक्रोश के बाद नया आदेश:

    अरावली पर्वतमाला को लेकर खड़े हुए विवाद के बीच केंद्र सरकार ने अरावली रेंज में नया खनन पट्टा देने पर पूरी तरह से रोक लगा दी है। केंद्रीय  वन एवं पर्यावरण मंत्रालय ने हरियाणा, राजस्थान और गुजरात के मुख्य सचिवों को बुधवार को लिखे पत्र में साफ कहा है कि जब तक सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के तहत व उसकी ओर से मंजूर की गई नीति के तहत अरावली के संरक्षण और खनन के लिए नए क्षेत्रों की पहचान नहीं हो जाती है तब तब यह प्रतिबंध लागू रहेगा।

     

    फिर भी अगर सरकार ने अरावली के  क्षरण का रास्ता खोला तो इसके दुष्परिणाम केवल पर्यावरण तक सीमित नहीं रहेंगे- जल संकट, बढ़ती हीटवेव, कृषि उत्पादकता में गिरावट और सामाजिक-आर्थिक अस्थिरता इसके प्रत्यक्ष परिणाम होंगे। इसलिए आवश्यक है कि विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन स्थापित किया जाए, कानूनी संरक्षण को सख्ती से लागू किया जाए और स्थानीय समुदायों को संरक्षण की प्रक्रिया में भागीदार बनाया जाए। क्योंकि अरावली का संरक्षण केवल प्रकृति बचाने का प्रश्न नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के सुरक्षित भविष्य की शर्त है। आज लिया गया निर्णय ही तय करेगा कि अरावली एक चेतावनी बनकर रह जाएगी या भारत की सतत विकास यात्रा की मजबूत आधारशिला।

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