हाल के दिनों में वैश्विक अर्थव्यवस्था में एक अजीब विरोधाभास देखने को मिल रहा है। आमतौर पर जब भी दुनिया के किसी हिस्से में युद्ध या भू-राजनीतिक तनाव बढ़ता है, तो निवेशक सुरक्षित निवेश (Safe Haven) के रूप में सोने की ओर भागते हैं। लेकिन वर्तमान पश्चिम एशिया के युद्ध ने इस परंपरा को तोड़ दिया है।
सोने की कीमतों में भारी गिरावट के प्रमुख कारण
समाचार रिपोर्ट के अनुसार, जनवरी 2026 के अपने उच्चतम स्तर से सोने की कीमतें लगभग 27% तक गिर चुकी हैं। मल्टी-कमोडिटी एक्सचेंज (MCX) पर सोना गिरकर 1.41 लाख रुपये प्रति 10 ग्राम के स्तर पर आ गया है। इस गिरावट के पीछे निम्नलिखित मुख्य कारण हैं:
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कच्चे तेल की आसमान छूती कीमतें: पश्चिम एशिया में संघर्ष के कारण कच्चे तेल (Crude Oil) के दाम बढ़ गए हैं। जब तेल महंगा होता है, तो वैश्विक स्तर पर मुद्रास्फीति (Inflation) बढ़ने का खतरा पैदा हो जाता है।
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ब्याज दरों में कटौती की उम्मीद खत्म होना: बढ़ती महंगाई को देखते हुए अब यह माना जा रहा है कि अमेरिकी फेडरल रिजर्व और भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ब्याज दरों में कटौती नहीं करेंगे। ऊँची ब्याज दरें सोने के लिए नकारात्मक होती हैं क्योंकि सोना कोई ब्याज (yield) नहीं देता, जबकि बॉन्ड्स और ट्रेजरी में निवेश अधिक आकर्षक हो जाता है।
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डॉलर का मजबूत होना: इस संकट के समय में अमेरिकी डॉलर निवेशकों की पहली पसंद बनकर उभरा है। डॉलर इंडेक्स, जो दुनिया की प्रमुख मुद्राओं के मुकाबले डॉलर की ताकत मापता है, बढ़कर 100 के स्तर पर पहुंच गया है।
भारतीय अर्थव्यवस्था और RBI का रुख
भारत के संदर्भ में देखें तो RBI के लिए महंगाई को 2% से 6% के दायरे में रखना एक चुनौती होगी। यदि कच्चे तेल की कीमतें लंबे समय तक ऊँची रहती हैं, तो RBI ‘हॉकिश’ (कठोर) रुख अपना सकता है। इसका मतलब है कि ब्याज दरों में कमी आने में अभी काफी समय लग सकता है, जो शेयर बाजार के लिए एक दबाव का संकेत है।
निष्कर्ष
वर्तमान स्थिति में सोने की चमक फीकी पड़ने का मुख्य कारण ‘मुद्रास्फीति का डर’ और ‘डॉलर की मजबूती’ है। जहां 2025 और शुरुआती 2026 में सोने ने रिकॉर्ड ऊंचाइयों को छुआ था, वहीं अब निवेशक मुनाफ़ा वसूली (Profit Booking) कर डॉलर और बॉन्ड्स की ओर रुख कर रहे हैं।
