पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव और अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में आए 50 प्रतिशत के भारी उछाल के बीच, भारत सरकार ने आम जनता और तेल कंपनियों को राहत देने के लिए एक बड़ा कदम उठाया है। शुक्रवार को केंद्र सरकार ने पेट्रोल और डीजल पर लगने वाली स्पेशल एडिशनल एक्साइज ड्यूटी (SAED) में ₹10 प्रति लीटर की कटौती की घोषणा की।
आम आदमी को राहत या कंपनियों का बचाव?
इस कटौती का मुख्य उद्देश्य पेट्रोल और डीजल की खुदरा कीमतों को मौजूदा स्तर पर स्थिर रखना है। दरअसल, अंतरराष्ट्रीय कीमतों में बढ़ोतरी के बावजूद सार्वजनिक क्षेत्र की तेल विपणन कंपनियों (OMCs) जैसे IOC, BPCL और HPCL ने कीमतों में बढ़ोतरी नहीं की थी, जिससे उन्हें प्रतिदिन लगभग ₹2,400 करोड़ का नुकसान (under-recovery) हो रहा था।
सरकार की इस कटौती से:
-
ओएमसी (OMCs) के वार्षिक नुकसान का लगभग 30-40% हिस्सा कम हो जाएगा।
-
पेट्रोल पर कुल एक्साइज ड्यूटी अब ₹11.9 प्रति लीटर और डीजल पर ₹7.8 प्रति लीटर रह गई है।
-
निजी रिटेलर जैसे ‘नयारा एनर्जी’ ने पहले ही पेट्रोल पर ₹5 और डीजल पर ₹3 की बढ़ोतरी कर दी थी, लेकिन सरकारी कंपनियां कीमतें स्थिर रखेंगी।
सरकारी खजाने पर असर
अर्थशास्त्रियों और रेटिंग एजेंसियों के अनुसार, इस फैसले का सरकारी राजस्व पर गहरा असर पड़ेगा:
-
सालाना खर्च: सरकार को इस कटौती के कारण लगभग ₹1.5 लाख करोड़ के राजस्व का नुकसान होगा।
-
ICRA का अनुमान: रेटिंग एजेंसी ICRA के मुताबिक, एक्साइज ड्यूटी में ₹1 की कटौती से सालाना ₹15,000-16,000 करोड़ का नुकसान होता है, इस लिहाज से ₹10 की कटौती एक बड़ा वित्तीय बोझ है।
निर्यात पर लगाम और घरेलू आपूर्ति
घरेलू बाजार में ईंधन की पर्याप्त उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए सरकार ने डीजल और एविएशन टर्बाइन फ्यूल (ATF) के निर्यात पर भी शुल्क लगा दिया है।
-
डीजल निर्यात पर ₹21.5 प्रति लीटर और ATF पर ₹29.5 प्रति लीटर का शुल्क लगाया गया है।
-
इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि रिफाइनरियां लाभ के चक्कर में तेल बाहर भेजने के बजाय पहले घरेलू मांग को पूरा करें।
विशेषज्ञ की राय: एमके ग्लोबल की मुख्य अर्थशास्त्री माधवी अरोरा का कहना है कि यह पश्चिम एशिया संघर्ष का भारतीय अर्थव्यवस्था पर पहला बड़ा वित्तीय प्रभाव है।
