व्यक्तिगत स्वतंत्रता और वैवाहिक संस्था के बीच संतुलन को लेकर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि यदि कोई विवाहित पुरुष किसी अन्य महिला के साथ सहमति से ‘लिव-इन रिलेशनशिप’ (Live-in Relationship) में रहता है, तो इसे केवल इस आधार पर ‘अपराध’ नहीं माना जा सकता। कोर्ट ने जोर देकर कहा कि दो वयस्कों के बीच सहमति से बना संबंध उनकी व्यक्तिगत पसंद का हिस्सा है।
मामला क्या था?
यह फैसला एक याचिका पर सुनवाई के दौरान आया जिसमें एक विवाहित पुरुष और उसकी लिव-इन पार्टनर ने पुलिस उत्पीड़न के खिलाफ सुरक्षा की मांग की थी। पुरुष की पत्नी ने उनके रिश्ते के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराई थी, जिसमें आरोप लगाया गया था कि पति का अन्य महिला के साथ रहना कानूनन अपराध है।
कोर्ट की मुख्य टिप्पणियाँ: ‘नैतिकता बनाम कानून’
न्यायमूर्ति की पीठ ने मामले की गंभीरता को देखते हुए कई महत्वपूर्ण कानूनी बिंदुओं को स्पष्ट किया:
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अपराध की श्रेणी: कोर्ट ने कहा कि भारतीय दंड संहिता (IPC) या अब लागू भारतीय न्याय संहिता (BNS) के तहत, दो वयस्कों का सहमति से साथ रहना तब तक अपराध नहीं है जब तक कि उसमें जबरदस्ती, धोखाधड़ी या द्विविवाह (Bigamy) के विशिष्ट तत्व शामिल न हों।
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व्यक्तिगत स्वतंत्रता (अनुच्छेद 21): अदालत ने संविधान के अनुच्छेद 21 का हवाला देते हुए कहा कि प्रत्येक नागरिक को अपनी पसंद के व्यक्ति के साथ रहने का अधिकार है। समाज की ‘नैतिकता’ किसी व्यक्ति के ‘संवैधानिक अधिकारों’ पर हावी नहीं हो सकती।
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द्विविवाह (Bigamy) से भिन्नता: कोर्ट ने स्पष्ट किया कि लिव-इन में रहना ‘दूसरी शादी’ करने के समान नहीं है। द्विविवाह एक दंडनीय अपराध है, लेकिन बिना शादी किए साथ रहना इस श्रेणी में नहीं आता।
27 मार्च 2026 तक की अपडेटेड कानूनी स्थिति
वर्तमान कानूनी परिदृश्य में, उच्च न्यायालयों और सुप्रीम कोर्ट ने लिव-इन रिलेशनशिप को लेकर अपने रुख को और अधिक स्पष्ट किया है:
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घरेलू हिंसा से सुरक्षा: 2026 तक के कानूनी प्रावधानों के अनुसार, लिव-इन पार्टनर को भी घरेलू हिंसा अधिनियम के तहत सुरक्षा प्राप्त है।
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पंजीकरण का मुद्दा: हालांकि कुछ राज्यों में लिव-इन के पंजीकरण (Registration) को लेकर चर्चाएं और कानून आए हैं, लेकिन इलाहाबाद हाईकोर्ट ने साफ किया कि पंजीकरण न होने मात्र से संबंध अवैध या ‘अपराधिक’ नहीं हो जाता।
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बच्चों के अधिकार: कोर्ट ने दोहराया कि ऐसे संबंधों से पैदा होने वाले बच्चों को पिता की संपत्ति में कानूनी अधिकार प्राप्त होंगे और उन्हें ‘अवैध’ नहीं माना जाएगा।
सामाजिक प्रभाव और निष्कर्ष
हाईकोर्ट का यह फैसला उन लोगों के लिए एक बड़ी राहत है जो सामाजिक और पारिवारिक दबाव के कारण कानूनी उत्पीड़न का सामना करते हैं। हालांकि, कोर्ट ने यह भी कहा कि वह ऐसी जीवनशैली को ‘बढ़ावा’ नहीं दे रहा है, लेकिन कानून के रखवाले के रूप में वह किसी की व्यक्तिगत आजादी में अवैध हस्तक्षेप की अनुमति भी नहीं दे सकता।
यह निर्णय समाज में ‘कानून’ और ‘सामाजिक शुचिता’ के बीच की धुंधली रेखा को और अधिक स्पष्ट करता है।
