लखनऊ: इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने एक ऐतिहासिक निर्णय सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि मां के गर्भ में पल रहा 5 महीने या उससे अधिक की आयु का भ्रूण भी कानून की नजर में एक ‘जीवित व्यक्ति’ के समान है। अदालत ने कहा कि यदि किसी रेल हादसे में गर्भवती महिला की मृत्यु के साथ भ्रूण की भी क्षति होती है, तो रेलवे को उस अजन्मे बच्चे के लिए अलग से मुआवजा देना होगा।
क्या है पूरा मामला?
यह मामला साल 2018 का है, जब भानमती नामक एक महिला बाराबंकी रेलवे स्टेशन पर ट्रेन में चढ़ते समय गिर गई थीं। वह 8-9 महीने की गर्भवती थीं। इस दुर्घटना में गंभीर चोटों के कारण अस्पताल में इलाज के दौरान उनकी और उनके अजन्मे बच्चे की मृत्यु हो गई थी।
पिछले साल (फरवरी 2025) रेलवे दावा न्यायाधिकरण (Railway Claims Tribunal) ने महिला की मृत्यु के लिए 8 लाख रुपये का मुआवजा तो मंजूर किया था, लेकिन अजन्मे बच्चे के लिए किसी भी अतिरिक्त राहत को यह कहते हुए खारिज कर दिया था कि ‘भ्रूण’ रेलवे अधिनियम के तहत मुआवजे का हकदार नहीं है।
हाईकोर्ट की अहम टिप्पणियाँ
न्यायमूर्ति प्रशांत कुमार की पीठ ने न्यायाधिकरण के फैसले को संशोधित करते हुए रेलवे को 8 लाख रुपये का अतिरिक्त मुआवजा देने का आदेश दिया। कोर्ट ने अपने फैसले में कई महत्वपूर्ण बातें कहीं:
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स्वतंत्र अस्तित्व: “गर्भ में पल रहे शिशु के अधिकार देश के कानूनों द्वारा संरक्षित हैं। वह महिला के भीतर एक अलग जीवन है और उसकी मृत्यु वास्तव में एक शिशु की मृत्यु के समान है।”
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5 महीने की सीमा: कोर्ट ने स्पष्ट किया कि 5 महीने या उससे अधिक का भ्रूण एक जीवित बच्चे के समान माना जाएगा।
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कानूनी स्थिति: “अजन्मे बच्चे को एक व्यक्ति माना जा सकता है, जिसकी मृत्यु के लिए क्षतिपूर्ति का मुकदमा चलाया जा सकता है।”
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मानवीय दृष्टिकोण: पीठ ने टिप्पणी की कि यदि दुर्घटना न हुई होती, तो वह बच्चा दुनिया का प्रकाश देखता। इसलिए, भ्रूण की मृत्यु को मां की मृत्यु से अलग एक स्वतंत्र दुर्घटना माना जाना चाहिए।
कुल 16 लाख रुपये का होगा भुगतान
अदालत के इस आदेश के बाद अब पीड़ित परिवार को कुल 16 लाख रुपये (8 लाख मां के लिए और 8 लाख अजन्मे बच्चे के लिए) के साथ-साथ निर्धारित ब्याज भी मिलेगा। यह फैसला भविष्य में होने वाले रेल दावों और सड़क दुर्घटनाओं के मामलों में एक नजीर (Precedent) साबित होगा, जहां अक्सर अजन्मे बच्चों के नुकसान को नजरअंदाज कर दिया जाता था।
