नई दिल्ली: भारत में कानून की सबसे कठोर सजा यानी ‘मृत्युदंड’ (Death Penalty) का इंतजार कर रहे कैदियों में महिलाओं की संख्या भी शामिल है। हालिया आंकड़ों के अनुसार, देश की विभिन्न जेलों में बंद कुल 571 मृत्युदंड प्राप्त कैदियों में से 21 महिलाएं हैं। ये महिलाएं आतंकवाद, सामूहिक हत्याकांड, और ‘ऑनर किलिंग’ जैसे जघन्य अपराधों के लिए दोषी ठहराई जा चुकी है।
प्रमुख तथ्य और आंकड़े
‘नेशनल एकेडमी ऑफ लीगल स्टडीज एंड रिसर्च’ (NALSAR) की रिपोर्ट के अनुसार, इन महिला कैदियों की स्थिति इस प्रकार है:
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सजा का इंतजार: इनमें से 4 महिलाएं ऐसी हैं जो एक दशक (10 साल) से भी अधिक समय से अपनी फांसी की सजा पर अमल का इंतजार कर रही हैं।
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क्षेत्रीय विवरण: फांसी की सजा पाने वाली इन महिलाओं में सबसे अधिक 9 महिलाएं अकेले उत्तर प्रदेश से हैं इसके अलावा ये कैदी केरल, हरियाणा, महाराष्ट्र, कर्नाटक, पंजाब, बिहार, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ की जेलों में बंद हैं।
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अपराध की प्रकृति: इन महिलाओं पर आतंकवाद, सामूहिक हत्याकांड, फिरौती के लिए अपहरण और हत्या, तथा परिवार के सदस्यों की जघन्य हत्या जैसे आरोप साबित हो चुके हैं।
चर्चित मामले: आतंकवाद से ऑनर किलिंग तक
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फहमीदा मोहम्मद हनीफ सैयद (आतंकवाद): सबसे पुराना मामला 2003 के मुंबई गेटवे ऑफ इंडिया और जवेरी बाजार बम धमाकों से जुड़ा है。 फहमीदा को 2009 में फांसी की सजा सुनाई गई थी और वह पिछले 16 वर्षों से सजा का इंतजार कर रही है।
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शबनम (उत्तर प्रदेश): अमरोहा की शबनम को अपने परिवार के सात सदस्यों की कुल्हाड़ी से हत्या करने का दोषी पाया गया था。 इलाहाबाद हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट ने उसकी फांसी की सजा को बरकरार रखा है।
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सोनम डाल (हरियाणा): सोनम को 2009 में अपने ही परिवार के सदस्यों की सामूहिक हत्या का दोषी पाया गया था।
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ऑनर किलिंग के मामले: उत्तर प्रदेश की जलधारा को 2017 में अपनी बेटी और उसके प्रेमी की हत्या (ऑनर किलिंग) के मामले में 2022 में फांसी की सजा सुनाई गई।
कानूनी प्रक्रिया और देरी के कारण
लेख के अनुसार, कई महिलाओं की सजा पर फिलहाल कानूनी पेंच फंसे हुए हैं:
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कई मामले इलाहाबाद हाई कोर्ट, पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट और अन्य उच्च न्यायालयों में पुष्टि (Confirmation) के लिए लंबित हैं।
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कुछ कैदियों की दया याचिकाएं (Mercy Petitions) विचाराधीन हैं, जबकि कुछ ने सुप्रीम कोर्ट में पुनर्विचार याचिकाएं दायर की हुई हैं।
मानवाधिकारों पर बहस
सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश, न्यायमूर्ति अभय एस. ओका ने इस बात पर जोर दिया है कि संविधान के अनुच्छेद 21 (जीवन का अधिकार) के संदर्भ में मृत्युदंड की संवैधानिकता पर पुनर्विचार करना आवश्यक है。 वहीं, मृत्युदंड प्राप्त कैदियों का प्रतिनिधित्व कर रहे युग मोहित चौधरी का तर्क है कि मृत्युदंड की लंबी प्रक्रिया के दौरान कैदी की गरिमा पूरी तरह समाप्त हो जाती है।
