नई दिल्ली।
दिल्ली उच्च न्यायालय ने हाल ही में एक जनहित याचिका (PIL) पर केंद्र सरकार को नोटिस जारी किया है, जिसमें यह सवाल उठाया गया है कि क्या कानून व्यवहार्य (viable) जमे हुए भ्रूणों को दान करने के बजाय नष्ट करने के लिए बाध्य कर सकता है, जबकि दोनों पक्षों की सहमति मौजूद हो।
याचिका में असिस्टेड रिप्रोडक्टिव टेक्नोलॉजी (रेगुलेशन) एक्ट, 2021 और उसके नियमों को चुनौती दी गई है। याचिकाकर्ता का कहना है कि कानून “परमार्थी, स्वैच्छिक और सहमति-आधारित भ्रूण दान” पर संपूर्ण प्रतिबंध लगाता है, जबकि यही कानून दाता के शुक्राणु और अंडाणु से भ्रूण बनाने की अनुमति देता है।
मौजूदा ढांचे के तहत जमे हुए भ्रूणों को अधिकतम 10 वर्षों तक सुरक्षित रखा जा सकता है, जिसके बाद उन्हें “नष्ट होने दिया जाना चाहिए” या शोध के लिए दान किया जा सकता है। याचिका इसे “ भ्रूणों का तर्कहीन विनाश” बताती है और तर्क देती है कि जब इच्छुक दंपति मौजूद हैं, तब उन्हें नष्ट करने का आदेश नैतिक रूप से असंगत है।
मुख्य न्यायाधीश डी. के. उपाध्याय और न्यायमूर्ति तेजस करिया की पीठ ने सुनवाई के दौरान कहा कि याचिकाकर्ता ART एक्ट की धारा 28 (जो भ्रूणों के भंडारण और प्रबंधन से संबंधित है) के दायरे का विस्तार चाह रहे हैं। अदालत ने इस पर केंद्र सरकार से जवाब मांगा है।
याचिका IVF विशेषज्ञ डॉ. अनिरुद्ध नारायण मालपानी द्वारा दायर की गई है। उनके वकील मनेका गुरुस्वामी ने अदालत में कहा, “कानून कुछ प्रकार की गैर-आनुवंशिक पेरेंटहुड की अनुमति देता है, लेकिन अन्य को रोक देता है। यह विधायी चूक प्रतीत होती है।”
कानून जमे हुए भ्रूणों पर क्या अनुमति देता है?
ART अधिनियम, 2021 नियंत्रित परिस्थितियों में शुक्राणु और अंडाणु के परोपकारी दान की अनुमति देता है। यह “डबल-डोनर IVF” की भी अनुमति देता है, जिसमें दाता के शुक्राणु और अंडाणु से भ्रूण बनाकर दंपति के गर्भ में प्रत्यारोपित किया जा सकता है। ऐसे मामलों में बच्चे का माता-पिता से कोई आनुवंशिक संबंध नहीं होता और कानून इसे स्वीकार करता है।
लेकिन यही कानून अतिरिक्त जमे हुए भ्रूणों के दान की अनुमति नहीं देता:
IVF प्रक्रिया में सफलता की संभावना बढ़ाने के लिए कई भ्रूण बनाए जाते हैं, लेकिन सभी प्रत्यारोपित नहीं होते। बाद में कई दंपति और बच्चे नहीं चाहते, लेकिन उनके भ्रूण जमे रहते हैं। यहीं आकर कानून उनके उपयोग पर रोक लगा देता है।
प्रतिबंध कैसे लागू होता है?
कानून में “भ्रूण गोद लेने” पर सीधा प्रतिबंध नहीं है, लेकिन विभिन्न प्रावधान मिलकर इसे व्यावहारिक रूप से असंभव बना देते हैं।
• क्लीनिक केवल मूल दंपति के लिए ही भ्रूण सुरक्षित रख सकते हैं।
• इन्हें किसी अन्य व्यक्ति को स्थानांतरित नहीं किया जा सकता।
• केवल वही दंपति अपने भ्रूण वापस ले सकते हैं, वह भी नियामक अनुमति के साथ।
• 10 साल बाद भ्रूण को नष्ट करना या शोध के लिए दान करना अनिवार्य है।
• किसी अन्य दंपति को प्रजनन के लिए दान करने का कोई प्रावधान नहीं है।
सहमति फॉर्म में भी दंपति से पूछा जाता है कि मृत्यु या अलगाव की स्थिति में भ्रूण का क्या होगा, लेकिन किसी अन्य दंपति को दान करने का विकल्प नहीं दिया जाता।
नवविकसित भूण बनाम जमे हुए भ्रूण का विवाद
याचिका का मुख्य तर्क यह है कि कानून नवविकसित दाता भ्रूण और जमे हुए भ्रूण के बीच भेद करता है।
नवविकसित दाता भ्रूण को दंपति में प्रत्यारोपित किया जा सकता है, लेकिन वही भ्रूण यदि जमाया गया हो तो उसे किसी और को नहीं दिया जा सकता – जबकि जैविक रूप से दोनों समान होते हैं और IVF में नियमित रूप से उपयोग होते हैं। याचिका इसे “दोहरा मापदंड” कहती है ।
संवैधानिक चुनौती
याचिका अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) और अनुच्छेद 21 (जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार) के आधार पर कानून को चुनौती देती है।
अनुच्छेद 14 के तहत तर्क:
• कानून ताजा और जमे हुए भ्रूणों के बीच मनमाना भेद करता है।
• दोनों मामलों में बच्चे का माता-पिता से आनुवंशिक संबंध नहीं होता।
• यह भेद “बुद्धिसंगत आधार” पर आधारित नहीं है।
अनुच्छेद 21 के तहत तर्क:
• प्रजनन का निर्णय व्यक्तिगत स्वतंत्रता और गरिमा का हिस्सा है।
• राज्य द्वारा भ्रूण दान पर रोक लगाना प्रजनन स्वतंत्रता में अनुचित हस्तक्षेप है।
याचिका में कहा गया है कि 10 साल बाद भ्रूण को नष्ट करने का आदेश, जबकि इच्छुक दंपति मौजूद हों, “विधायी बेतुकापन” है।
यह मामला क्यों महत्वपूर्ण है?
भारत में अनुमानतः 27–30 मिलियन दंपति बांझपन से प्रभावित हैं। IVF महंगा है और कई बार दोहराना पड़ता है। पारंपरिक गोद लेने की प्रक्रिया लंबी होती है।
याचिका का तर्क है कि भ्रूण दान एक विनियमित विकल्प बन सकता है, जिससे कई दंपतियों को माता-पिता बनने का अवसर मिल सकेगा।
साथ ही यह भी कहा गया है कि संपन्न दंपति विदेश जाकर भ्रूण दान करा सकते हैं, जबकि गरीब दंपति नहीं जिससे प्रजनन अधिकार आर्थिक क्षमता पर निर्भर हो जाता है।
