उत्तर प्रदेश के कई जिलों से भूजल (Groundwater) की गुणवत्ता को लेकर आए ताजा आंकड़े डराने वाले हैं। वैज्ञानिक एवं औद्योगिक अनुसंधान परिषद (CSIR) और भारतीय विष विज्ञान अनुसंधान संस्थान (IITR) की संयुक्त रिपोर्ट ने राज्य के स्वास्थ्य और पर्यावरण तंत्र के लिए खतरे की घंटी बजा दी है। रिपोर्ट के अनुसार, राज्य के एक बड़े हिस्से के पीने के पानी में यूरेनियम, फ्लोराइड, और आर्सेनिक जैसे घातक तत्व निर्धारित मानकों से कहीं अधिक पाए गए हैं।
1. यूरेनियम और भारी धातुओं का बढ़ता जाल
रिपोर्ट में सबसे चौंकाने वाला खुलासा यूरेनियम को लेकर हुआ है।
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यूरेनियम की मौजूदगी: वाराणसी, सोनभद्र, अमरोहा और उन्नाव सहित राज्य के 22 जिलों में भूजल में यूरेनियम के अंश मिले हैं। यह पहली बार है जब इतनी बड़ी संख्या में जिलों में रेडियोधर्मी तत्वों की उपस्थिति दर्ज की गई है।
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फ्लोराइड और आर्सेनिक: अलीगढ़ सहित 24 जिलों में फ्लोराइड और 14 जिलों में आर्सेनिक की मात्रा सामान्य से अधिक है। ये तत्व हड्डियों की कमजोरी और कैंसर जैसी गंभीर बीमारियों का कारण बनते हैं।
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लेड (सीसा): बदायूं और चंदौली जिलों में सीसे की मात्रा खतरनाक स्तर तक पहुँच गई है।
2. जिलावार प्रदूषण का डेटा (रिपोर्ट के मुख्य अंश)
| प्रदूषक तत्व | प्रभावित जिलों की संख्या | प्रमुख जिले |
| यूरेनियम | 22 | वाराणसी, सोनभद्र, अमरोहा, उन्नाव |
| फ्लोराइड | 24 | अलीगढ़, मेरठ, आगरा |
| नाइट्रेट | 48 | पश्चिमी और मध्य यूपी के जिले |
| आयरन (लोहा) | 46 | तराई और पूर्वांचल के जिले |
| मैंगनीज | 26 | औद्योगिक बेल्ट |
3. औद्योगिक प्रदूषण और नदियों का प्रभाव
केंद्रीय भूजल बोर्ड के अनुसार, मेरठ, अलीगढ़, बुलंदशहर, मुजफ्फरनगर, आगरा और मथुरा के औद्योगिक क्षेत्रों के पास स्थिति सबसे अधिक चिंताजनक है।
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यमुना और हिंडन का किनारा: इन नदियों के किनारे स्थित बोरवेल के नमूनों में भारी धातुओं (Heavy Metals) की मौजूदगी दर्ज की गई है। विशेषज्ञों का मानना है कि औद्योगिक अपशिष्ट (Industrial Waste) को सीधे जमीन के नीचे डंप करने और नदियों के दूषित पानी के जमीन में रिसने से यह स्थिति पैदा हुई है।
4. संसद में गूँजा मुद्दा: क्या कहता है डेटा?
विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्री जितेंद्र सिंह ने लोकसभा में पेश रिपोर्ट में बताया कि:
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भूजल पुनर्भरण: 2017 में वार्षिक भूजल पुनर्भरण 69.92 अरब घन मीटर था, जो 2025 में बढ़कर 73.39 अरब घन मीटर हो गया है।
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अंधाधुंध दोहन: पानी बढ़ने के बावजूद, दोहन की स्थिति जस की तस बनी हुई है। वर्तमान में भूजल उपयोग 70% के स्तर पर है, जो सुरक्षित सीमा के करीब है।
5. स्वास्थ्य पर प्रभाव और चुनौतियां
विशेषज्ञों के अनुसार, भूजल में इन तत्वों की अधिकता से न केवल इंसानों बल्कि पशुओं और फसलों पर भी बुरा असर पड़ रहा है। औद्योगिक अपशिष्ट और शहरी विस्तार का बढ़ता दबाव प्राकृतिक जल स्रोतों को स्थायी रूप से नष्ट कर रहा है।
News Drift Analysis: उत्तर प्रदेश की यह स्थिति “जल जीवन मिशन” जैसी योजनाओं के सामने बड़ी चुनौती पेश करती है। केवल नल से जल पहुँचाना काफी नहीं होगा, बल्कि पानी के स्रोतों को शुद्ध रखना और उद्योगों की जवाबदेही तय करना अब समय की मांग है।
