पिछले कुछ वर्षों में, खाड़ी देशों ने बाहरी खतरों से निपटने के लिए महंगे अमेरिकी लड़ाकू विमान और रक्षा प्रणालियाँ खरीदी हैं। लेकिन अब इन प्रणालियों को ईरान के शाहेद (Shahed) ड्रोन से कड़ी चुनौती मिल रही है, जो बहुत ही कम कीमत में भारी तबाही मचाने में सक्षम है।
लागत का बड़ा अंतर (आसमान में चुनौती)
लेख के अनुसार, आधुनिक युद्ध अब “कम लागत वाली तकनीक” द्वारा आकार ले रहा है।
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लड़ाकू विमान: एक आधुनिक F-16 जेट की कीमत कम से कम $7 करोड़ है। इसे उड़ाने का खर्च ही $25,000 प्रति घंटा आता है।
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मिसाइलें: इन ड्रोनों को गिराने के लिए इस्तेमाल होने वाली मिसाइलों (जैसे AIM-9X साइडविंडर) की कीमत $4.85 लाख से $10 लाखतक होती है।
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शाहेद-136 ड्रोन: इसके विपरीत, एक ईरानी शाहेद ड्रोन की निर्माण लागत मात्र $20,000 से $50,000 के बीच है।
विशेषज्ञों का कहना है कि यह आर्थिक रूप से टिकाऊ नहीं है। अगर एक ड्रोन को गिराने के लिए लाखों डॉलर की मिसाइल दागी जाती है, तो रक्षक देश आर्थिक रूप से जल्दी हार जाएगा।
जमीनी रक्षा प्रणालियों पर दबाव
खाड़ी देश (जैसे सऊदी अरब, यूएई, कतर) अमेरिकी पैट्रियट (Patriot) और THAAD प्रणालियों पर निर्भर हैं।
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एक पैट्रियट मिसाइल की कीमत करीब $40 लाख है।
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THAAD इंटरसेप्टर की कीमत $1.3 करोड़ से $1.5 करोड़ के बीच है। ईरान द्वारा दागे गए हजारों ड्रोनों के सामने इन महंगी मिसाइलों का स्टॉक खत्म होना एक गंभीर समस्या बन गई है।
ईरान का शाहेद-136 ‘कामिकेज़’ ड्रोन: मुख्य विशेषताएँ
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प्रकार: वन-वे (आत्मघाती) ड्रोन।
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लागत: $20,000 – $30,000 प्रति यूनिट।
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रेंज: 3000 किमी | वजन: 200 किग्रा | पंखों का फैलाव: 2.5 मीटर।
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तकनीक: यह झुंड (swarms) में हमला करता है और रडार से बचने के लिए बहुत कम ऊंचाई (20-30 मीटर) पर उड़ सकता है।
सस्ते समाधान और भविष्य की राह
लेख में बताया गया है कि अब “लेजर हथियारों” और सस्ते “इंटरसेप्टर ड्रोनों” (जैसे ‘स्टिंग’ ड्रोन, जिसकी कीमत मात्र $2,000 है) पर ध्यान दिया जा रहा है।
भारत का संदर्भ: विशेषज्ञ राजीव कुमार नारंग के अनुसार, भारत-पाकिस्तान संघर्ष में भी ड्रोनों का बड़े पैमाने पर उपयोग देखा गया है। भारत अपनी स्वदेशी प्रणालियों जैसे ‘आकाशतीर’ और अन्य एंटी-ड्रोन तकनीकों को एकीकृत करने पर काम कर रहा है।
निष्कर्ष
युद्ध का अर्थशास्त्र बदल रहा है। अब केवल मारक क्षमता ही नहीं, बल्कि सुरक्षा की लागत भी यह तय करेगी कि युद्ध कौन जीतेगा। हालांकि, भारी बमबारी के लिए अभी भी मानवयुक्त विमानों की जरूरत है, लेकिन छोटे और सटीक हमलों के मामले में ड्रोनों ने बाजी मार ली है।
