मध्य पूर्व में बढ़ते तनाव और संघर्ष के बीच भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों और नागरिकों की सुरक्षा को लेकर पूरी तरह सतर्क है। हालिया रिपोर्टों के अनुसार, भारत ने अपनी कूटनीतिक सक्रियता और सुरक्षा रणनीतियों के माध्यम से यह सुनिश्चित किया है कि वैश्विक संघर्ष का असर देश की ईंधन आपूर्ति पर न पड़े।
1. होर्मुज जलडमरूमध्य से सुरक्षित निकासी
युद्ध प्रभावित होर्मुज जलडमरूमध्य, जो वैश्विक तेल और गैस व्यापार के लिए एक महत्वपूर्ण मार्ग है, वहां फंसे दो भारतीय ध्वज वाले जहाज ‘शिवालिक’ और ‘नंदा देवी’ शनिवार को सुरक्षित बाहर निकल गए हैं।
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ये जहाज लगभग 92,700 टन एलपीजी (LPG) लेकर भारत आ रहे हैं।
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अनुमान है कि इतनी गैस से 65 लाख से अधिक रसोई गैस सिलेंडर भरे जा सकते हैं।
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ये जहाज 16-17 मार्च तक गुजरात के मुंद्रा और कांडला बंदरगाहों पर पहुँचने की संभावना है।
2. ऊर्जा सुरक्षा के लिए कूटनीतिक प्रयास
भारत सरकार ने स्पष्ट किया है कि वह ईरान, अमेरिका, इजरायल और खाड़ी सहयोग परिषद (GCC) के देशों के साथ निरंतर संपर्क में है। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल के अनुसार:
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भारत का मुख्य लक्ष्य क्षेत्र में वस्तुओं और ऊर्जा के निर्बाध परिवहन को सुनिश्चित करना है।
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भारत ने अपील की है कि नागरिक बुनियादी ढांचे, विशेष रूप से ऊर्जा के स्रोतों को निशाना बनाने से बचा जाना चाहिए।
3. भारतीयों की घर वापसी
विदेश मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार, 28 फरवरी से अब तक 1,72,000 यात्री भारत लौट चुके हैं। जहाजरानी मंत्रालय और भारतीय दूतावास मिलकर भारतीय नाविकों की सुरक्षा की बारीकी से निगरानी कर रहे हैं। पिछले 24 घंटों में ही संचार केंद्रों को 312 फोन कॉल्स और 460 ईमेल प्राप्त हुए हैं, जो राहत कार्यों की सक्रियता को दर्शाते हैं।
4. पड़ोसी देशों पर प्रभाव (श्रीलंका का संदर्भ)
भारत की सतर्कता का लाभ केवल देश तक ही सीमित नहीं है। श्रीलंका में भी ईंधन की आपूर्ति बनी रहेगी। लंका इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन (LIOC) ने आश्वासन दिया है कि पश्चिम एशिया के संघर्ष के बावजूद श्रीलंका में ईंधन की कमी नहीं होने दी जाएगी।
निष्कर्ष: भारत की ‘सक्रिय कूटनीति’ और ‘त्वरित समुद्री संचालन’ ने यह साबित किया है कि वैश्विक अस्थिरता के समय में भी देश अपनी ऊर्जा सुरक्षा और नागरिकों के हितों की रक्षा करने में सक्षम है।
