भारतीय राजनीति में एक अभूतपूर्व हलचल देखने को मिल रही है। विपक्षी दलों का गठबंधन (INDIA Bloc) भारत के मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार के खिलाफ संसद में ‘हटाने का प्रस्ताव’ (Removal Motion) लाने की तैयारी कर रहा है। यह कदम विशेष रूप से पश्चिम बंगाल में मतदाता सूचियों के ‘स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन’ (SIR) और उसमें हुए कथित नाम हटाने के विवाद के बाद उठाया जा रहा है।
लेकिन क्या किसी मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाना इतना आसान है? क्या है वह कानून जिसका जिक्र विपक्ष और संविधान विशेषज्ञ कर रहे हैं? आइए विस्तार से समझते हैं।
क्या कहता है 2023 का नया कानून?
दिसंबर 2023 में संसद ने ‘मुख्य निर्वाचन आयुक्त और अन्य निर्वाचन आयुक्त (नियुक्ति, सेवा शर्तें और कार्यवधि) अधिनियम, 2023’ पारित किया था। इस कानून की धारा 11(2) स्पष्ट रूप से कहती है:
“मुख्य चुनाव आयुक्त को उनके पद से केवल उसी रीति से और उन्हीं आधारों पर हटाया जाएगा, जैसे कि उच्चतम न्यायालय (Supreme Court) के न्यायाधीश को हटाया जाता है।”
इसका अर्थ यह है कि CEC को सरकार अपनी मर्जी से नहीं हटा सकती। उन्हें हटाने की शक्ति केवल संसद के पास है, और वह भी एक बहुत ही कठिन प्रक्रिया के माध्यम से।
हटाने की प्रक्रिया: स्टेप-बाय-स्टेप गाइड
चूंकि प्रक्रिया सुप्रीम कोर्ट के जज जैसी है, इसलिए यह ‘न्यायाधीश (जांच) अधिनियम, 1968’ के तहत चलती है:
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नोटिस देना: यदि प्रस्ताव लोकसभा में लाया जाता है, तो कम से कम 100 सांसदों के हस्ताक्षर चाहिए। यदि राज्यसभा में लाया जाता है, तो 50 सांसदों के हस्ताक्षर अनिवार्य हैं।
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अध्यक्ष/सभापति का निर्णय: लोकसभा अध्यक्ष या राज्यसभा के सभापति इस नोटिस को स्वीकार या अस्वीकार कर सकते हैं।
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जांच समिति: यदि नोटिस स्वीकार हो जाता है, तो आरोपों की जांच के लिए 3 सदस्यीय समिति बनाई जाती है (जिसमें एक SC जज, एक HC के मुख्य न्यायाधीश और एक प्रतिष्ठित न्यायविद शामिल होते हैं)।
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संसद में वोटिंग: यदि समिति दोषी पाती है, तो संसद के दोनों सदनों में बहस और वोटिंग होती है।
‘विशेष बहुमत’ (Special Majority) की चुनौती
यही वह चरण है जहां यह प्रक्रिया सबसे कठिन हो जाती है। प्रस्ताव को पारित करने के लिए:
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सदन की कुल सदस्य संख्या का बहुमत होना चाहिए।
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वोटिंग के समय उपस्थित सदस्यों का दो-तिहाई (2/3) समर्थन मिलना अनिवार्य है।
वर्तमान राजनीतिक आंकड़ों को देखते हुए, विपक्ष के लिए दोनों सदनों में दो-तिहाई बहुमत जुटाना एक बड़ी चुनौती है।
किन आधारों पर हटाया जा सकता है?
संविधान और कानून के अनुसार, CEC को केवल दो ही स्थितियों में हटाया जा सकता है:
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सिद्ध कदाचार (Proven Misbehaviour): भ्रष्टाचार, पद का दुरुपयोग या संवैधानिक मर्यादा का उल्लंघन।
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अक्षमता (Incapacity): शारीरिक या मानसिक रूप से कर्तव्य निभाने में असमर्थ होना।
विपक्ष का आरोप है कि मतदाता सूची संशोधन प्रक्रिया में पारदर्शिता की कमी और ‘वोटर डिस्फ्रैंचाइज़मेंट’ (मतदाताओं को अधिकार से वंचित करना) ‘कदाचार’ की श्रेणी में आता है।
क्या पहले कभी ऐसा हुआ है?
भारत के इतिहास में अब तक किसी भी मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) को इस प्रक्रिया के माध्यम से हटाया नहीं गया है। यदि विपक्ष यह नोटिस जमा करता है, तो यह भारतीय लोकतांत्रिक इतिहास में अपनी तरह का पहला मामला होगा। हालांकि, पूर्व में कुछ जजों के खिलाफ ऐसी प्रक्रिया शुरू हुई है, लेकिन वह भी शायद ही कभी अपने अंतिम अंजाम (बर्खास्तगी) तक पहुँची हो।
News Drift विश्लेषण:
विपक्ष का यह कदम भले ही संख्याबल के अभाव में सफल न हो पाए, लेकिन यह चुनाव आयोग जैसी संवैधानिक संस्था पर ‘दबाव’ बनाने और जनता के बीच चुनाव प्रक्रिया की निष्पक्षता पर सवाल उठाने की एक बड़ी राजनीतिक रणनीति है।
