हाल ही में केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी ने देश को 100% एथेनॉल ब्लेंडिंग का लक्ष्य रखने का सुझाव दिया है। वर्तमान में भारत अपनी तेल जरूरतों का लगभग 87% आयात करता है, जिस पर सालाना ₹22 लाख करोड़ खर्च होते हैं। ऐसे में एथेनॉल जैसे स्वदेशी और हरित ईंधन को अपनाना न केवल आर्थिक बल्कि रणनीतिक आवश्यकता भी बन गया है।
1. एथेनॉल ब्लेंडिंग क्या है?
एथेनॉल एक प्रकार का अल्कोहल है (C₂H₅OH), जिसे मुख्य रूप से गन्ने के रस, शीरे (molasses), मक्का और खराब हो चुके अनाज जैसे कृषि उत्पादों से तैयार किया जाता है। जब इसे एक निश्चित अनुपात में पेट्रोल के साथ मिलाया जाता है, तो इस प्रक्रिया को एथेनॉल ब्लेंडिंग कहते हैं।
- E20: 20% एथेनॉल + 80% पेट्रोल।
- E100: 100% एथेनॉल (शुद्ध रूप में ईंधन के रूप में उपयोग)।
2. भारत में वर्तमान स्थिति
भारत ने पिछले एक दशक में इस क्षेत्र में अभूतपूर्व प्रगति की है:
- उपलब्धि: 2013-14 में ब्लेंडिंग दर मात्र 1.5% थी, जो 2024 तक लगभग 18% और अप्रैल 2026 तक 20% (E20) के लक्ष्य को छू रही है।
- अर्थव्यवस्था: एथेनॉल कार्यक्रम ने अब तक ₹1.1 लाख करोड़ से अधिक की विदेशी मुद्रा बचाई है।
- तकनीक: भारत अब फ्लेक्स-फ्यूएल (Flex-Fuel) वाहनों को बढ़ावा दे रहा है, जो 20% से लेकर 100% तक किसी भी अनुपात के मिश्रण पर चल सकते हैं।
3. 100% ब्लेंडिंग के लाभ और चुनौतियां
| लाभ (Benefits) | चुनौतियां (Challenges) |
| ऊर्जा सुरक्षा: तेल आयात पर निर्भरता कम होगी और पश्चिम एशिया के संकटों का भारत पर असर कम होगा। | इंजन अनुकूलता: मौजूदा पुराने इंजनों में 100% एथेनॉल डालने पर जंग (corrosion) की समस्या हो सकती है। |
| किसानों की आय: गन्ना और मक्का उत्पादक किसानों को अपनी फसल का बेहतर दाम मिलेगा। | खाद्य सुरक्षा: यदि अधिक जमीन का उपयोग केवल ईंधन उत्पादन के लिए होगा, तो अनाज की कमी हो सकती है। |
| पर्यावरण: एथेनॉल जलते समय कार्बन मोनोऑक्साइड और सल्फर डाइऑक्साइड का उत्सर्जन बहुत कम करता है। | पानी की खपत: गन्ने जैसी फसलों के लिए भारी मात्रा में पानी की आवश्यकता होती है। |
| विदेशी मुद्रा की बचत: भारत हर साल अरबों डॉलर बचाकर अपनी घरेलू अर्थव्यवस्था में लगा सकेगा। | लॉजिस्टिक्स: देश भर में एथेनॉल भंडारण और वितरण के लिए बुनियादी ढांचे (Infrastructure) की कमी। |
4. अन्य देशों की स्थिति (वैश्विक परिदृश्य)
ब्राजील: एथेनॉल ब्लेंडिंग में दुनिया का अग्रणी देश है। यहाँ 1970 के दशक से ही एथेनॉल का व्यापक उपयोग हो रहा है और आज वहां अधिकांश वाहन 100% एथेनॉल या उच्च ब्लेंडिंग पर चलते हैं।
अमेरिका: अमेरिका मक्के से बने एथेनॉल का सबसे बड़ा उत्पादक है और वहां E10 और E15 का बड़े पैमाने पर उपयोग होता है।
भारत की तुलना: भारत अब ब्राजील के मॉडल को अपनाने की कोशिश कर रहा है, जहाँ ‘अन्नदाता’ अब ‘ऊर्जादाता’ की भूमिका में आ रहे हैं।
निष्कर्ष
100% एथेनॉल ब्लेंडिंग का लक्ष्य महत्वाकांक्षी है, लेकिन नामुमकिन नहीं। यदि भारत अपनी कृषि अपशिष्ट (Crop Residue) और खराब अनाज का कुशलतापूर्वक उपयोग करे और वाहन निर्माता कंपनियां गुणवत्तापूर्ण फ्लेक्स-फ्यूएल इंजन बनाएं, तो भारत न केवल अपनी ऊर्जा जरूरतों को पूरा करेगा, बल्कि एक वैश्विक ‘ग्रीन लीडर’ के रूप में उभरेगा।
