उत्तर प्रदेश में इतिहास रचने की तैयारी है। भारत की 16वीं जनगणना के तहत उत्तर प्रदेश में दो चरणों में जनगणना 2027 होगी — पहला चरण 22 मई 2026 से शुरू होकर 20 जून 2026 तक चलेगा जिसमें मकानों की गणना होगी, और दूसरा चरण फरवरी 2027 में होगा जिसमें जातिगत जनगणना भी शामिल होगी।
यूपी में जनगणना 2027 — पूरा कार्यक्रम
- पहले चरण में 22 मई से 20 जून 2026 तक घरों की गणना (हाउस लिस्टिंग) की जाएगी, जबकि दूसरे चरण में 9 फरवरी से 28 फरवरी 2027 तक प्रत्येक व्यक्ति की गणना होगी — और इसी चरण में जातिगत जनगणना भी की जाएगी।
- यह पहली पूरी तरह से डिजिटल जनगणना होगी जिसमें डेटा मोबाइल ऐप के जरिए दर्ज किया जाएगा। साथ ही नागरिकों के लिए 7 मई से 21 मई 2026 तक Self-Enumeration Portal सक्रिय रहेगा जहां वे स्वयं जानकारी दर्ज कर सकते हैं।
- जनगणना का अंतिम समय 1 मार्च 2027 की रात 12 बजे निर्धारित किया गया है जिसके आधार पर देश की कुल जनसंख्या घोषित की जाएगी।
- इस महाभियान की विशालता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि इसमें सभी 18 मंडल आयुक्त, 75 जिलाधिकारी, 17 नगर आयुक्त, 600 जिला स्तरीय अधिकारी, 1,195 चार्ज अधिकारी, 285 मास्टर ट्रेनर, 6,939 फील्ड ट्रेनर के साथ लगभग 5 लाख पर्यवेक्षक और प्रगणक शामिल होंगे।
भारत में जातिगत जनगणना का इतिहास — 1872 से 2027 तक
जातिगत जनगणना का विषय भारत में कोई नया नहीं है। इसकी जड़ें ब्रिटिश शासन काल तक जाती हैं।
1872 — पहली जनगणना: ब्रिटिश हुकूमत के वक्त देश में पहली बार 1872 में जनगणना हुई, जिसमें केवल कुछ प्रमुख जातियों का उल्लेख था।
1881–1931 — जाति गणना की नियमित परंपरा: 1881 से 1931 तक ब्रिटिश शासन के दौरान जनगणना की प्रक्रिया में जाति गणना एक नियमित प्रक्रिया थी। इस दौरान हर दशक में जातियों की पूरी गिनती होती थी।
1931 — आखिरी पूर्ण जातिगत जनगणना: 1931 में स्वतंत्र भारत से पहले की आखिरी जातिगत जनगणना हुई जिसमें 4,147 जातियां दर्ज की गईं। यही आंकड़े आज भी आरक्षण नीति की रीढ़ माने जाते हैं।
1941 — जनगणना हुई, आंकड़े छुपे: 1941 में भी जातिगत जनगणना हुई, लेकिन इसे सार्वजनिक नहीं किया गया। द्वितीय विश्व युद्ध और फिर देश के विभाजन की आपाधापी में यह मुद्दा दब गया।
1947 के बाद — जाति के आंकड़े बंद: आज़ादी के बाद नेहरू सरकार ने जनगणना में जाति कॉलम को हटा दिया। तर्क था कि जाति के आंकड़े सामाजिक विभाजन को बढ़ाएंगे और देश को एकजुट करने में बाधा बनेंगे। हालांकि SC और ST की गणना जारी रही।
1953 — काका कालेलकर कमेटी: 1953 में प्रधानमंत्री नेहरू ने काका कालेलकर कमेटी का गठन किया था। इस आयोग ने 1931 की जनगणना के जातिगत आंकड़ों के आधार पर ओबीसी को आरक्षण देने पर विचार किया।
1980 — मंडल आयोग: 1931 की रिपोर्ट और मंडल कमीशन के शोध के अनुसार देश में पिछड़े वर्ग की आबादी 54 प्रतिशत आंकी गई। 1990 में वी.पी. सिंह सरकार ने इसी आधार पर ओबीसी को 27 प्रतिशत आरक्षण दिया — और देश की राजनीति बदल गई।
2011 — SECC की असफलता: 2011 में यूपीए सरकार ने सामाजिक-आर्थिक और जाति जनगणना (SECC) कराई, लेकिन आंकड़े अशुद्धियों के कारण सार्वजनिक नहीं किए गए। SECC में 46 लाख से अधिक जाति, उपजाति, उपनाम और गोत्र के नाम दर्ज हुए — डेटा पर संदेह के चलते इसे रोका गया।
2025 — केंद्र सरकार का ऐतिहासिक फैसला: केंद्रीय मंत्री अश्विनी वैष्णव ने 30 अप्रैल को घोषणा की कि आगामी जनगणना में जातिगत गणना को ‘पारदर्शी’ तरीके से शामिल किया जाएगा।
2027 — इतिहास की पुनरावृत्ति: उत्तर प्रदेश के जनगणना निदेशक शीतल वर्मा ने बताया कि अब तक होने वाली जनगणना में इस तरह व्यक्तिगत स्तर पर जातिगत जानकारी नहीं ली जाती थी — इस बार केंद्र सरकार की नीति के तहत जातिगत आंकड़ों को भी शामिल किया जा रहा है।
राज्यों की अगुवाई — बिहार ने दिखाई राह
जब तक केंद्र सरकार इस विषय पर चुप्पी साधे रही, कई राज्यों ने खुद पहल की। बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने 2023 में राज्य स्तरीय जाति सर्वेक्षण कराया, जिसमें ओबीसी और ईबीसी वर्गों की आबादी 63 प्रतिशत से अधिक पाई गई। इसने राष्ट्रीय स्तर पर जातिगत जनगणना की मांग को और तेज कर दिया। कर्नाटक और तेलंगाना ने भी इसी दिशा में कदम उठाए। विपक्षी दलों — विशेषकर कांग्रेस, सपा और राजद — ने इसे 2024 के लोकसभा चुनाव में प्रमुख मुद्दा बनाया, जिसके बाद भाजपा के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार को भी इस माँग को स्वीकार करना पड़ा।
जातिगत जनगणना के लाभ — क्यों है यह ज़रूरी?
1. नीति निर्माण में सटीकता
अभी तक सरकारी योजनाएं और आरक्षण नीतियां 1931 के पुराने आंकड़ों पर आधारित हैं। 94 साल में देश का सामाजिक स्वरूप बदल चुका है। नए आंकड़े मिलने पर योजनाओं की सटीक टार्गेटिंग होगी — सही जाति तक, सही लाभ।
2. आरक्षण की वास्तविक समीक्षा संभव
वर्तमान में ओबीसी आरक्षण 27 प्रतिशत है, जबकि बिहार सर्वे के अनुसार उनकी जनसंख्या 60 प्रतिशत से अधिक है। जातिगत जनगणना के बाद आरक्षण की समीक्षा तथ्यों के आधार पर हो सकेगी।
3. सामाजिक-आर्थिक असमानता का सटीक चित्र
किस जाति में साक्षरता कितनी है, कौन सी जाति आज भी गरीबी रेखा के नीचे है, कहां रोजगार की कमी है — ये सब तथ्य नीतिनिर्माताओं को मिलेंगे।
4. विकास योजनाओं की जवाबदेही
सरकार का कहना है कि यह जनगणना आने वाले समय में विकास योजनाओं और नीतियों के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी।
5. समाज की वास्तविक तस्वीर
जो जातियां उपेक्षित रह गईं, जिनकी आवाज़ राजनीतिक पटल पर नहीं पहुंची — उनकी संख्या और स्थिति सामने आएगी।
चुनौतियां और विवाद — आसान नहीं है यह राह
1. SOP अभी तैयार नहीं
जातिगत जनगणना की तैयारियां तो शुरू हो गई हैं, लेकिन अभी इसकी Standard Operating Procedure (SOP) तय होना बाकी है। बिना स्पष्ट प्रक्रिया के डेटा में गड़बड़ी की आशंका बनी रहेगी।
2. जातियों की पहचान का पेचीदा सवाल
2011 की SECC में 46 लाख से अधिक जाति, उपजाति, उपनाम और गोत्र के नाम दर्ज हुए। एक ही जाति अलग-अलग राज्यों में अलग नामों से जानी जाती है — मानकीकरण कैसे होगा, यह बड़ी चुनौती है।
3. सामाजिक ध्रुवीकरण का खतरा
आलोचकों का कहना है कि जातिगत आंकड़े सार्वजनिक होने से जातीय राजनीति और तेज होगी। हर जाति अपनी संख्या के आधार पर अधिक हिस्सेदारी मांगेगी।
4. डेटा गोपनीयता
अधिकारियों का कहना है कि जातिगत जनगणना कैसे होगी, किन नियमों का पालन होगा और डेटा किस तरीके से सुरक्षित रखा जाएगा — इसके लिए विस्तृत दिशा-निर्देश तैयार किए जा रहे हैं। व्यक्तिगत जातिगत जानकारी का दुरुपयोग न हो, यह सुनिश्चित करना जरूरी है।
5. राजनीतिक हथियार बनने का डर
जानकार कहते हैं कि राजनीतिक रूप से जातिगत जनगणना अधिक फायदेमंद के तौर पर देखी जा रही है। आशंका है कि डेटा का इस्तेमाल वोटबैंक की राजनीति के लिए हो और सामाजिक एकता कमज़ोर हो।
6. प्रशिक्षण और गुणवत्ता
5 लाख से अधिक कर्मचारियों को संवेदनशील जातिगत प्रश्न पूछने के लिए पूरी तरह प्रशिक्षित करना — यह प्रशासनिक रूप से बेहद कठिन कार्य है।
उत्तर प्रदेश में क्यों है यह जनगणना खास?
उत्तर प्रदेश देश का सबसे अधिक आबादी वाला राज्य है — लगभग 24 करोड़ की जनसंख्या। यहाँ जातीय समीकरण देश की राजनीति को सीधे प्रभावित करते हैं। यादव, कुर्मी, जाटव, ब्राह्मण, राजपूत, निषाद, मौर्य, लोधी — दर्जनों जातियां हैं जो अलग-अलग राजनीतिक दलों की धुरी हैं।
उत्तर प्रदेश की राजनीति और सामाजिक समीकरणों के लिहाज से यह जनगणना बेहद महत्वपूर्ण मानी जा रही है — राजनीतिक दलों से लेकर सामाजिक संगठनों तक सभी की नजर इस प्रक्रिया पर बनी हुई है।
यूपी में जातिगत जनगणना के आंकड़े 2027 के बाद की राजनीति, आरक्षण नीति और सामाजिक न्याय की दशा-दिशा तय करने में निर्णायक भूमिका निभाएंगे।
क्या होगा आगे?
जातिगत जनगणना के आंकड़े आने के बाद सबसे बड़ा सवाल यह होगा कि सरकार इनका उपयोग कैसे करती है। क्या आरक्षण की सीमा 50 प्रतिशत की संवैधानिक सीमा से आगे बढ़ाने की कोशिश होगी? क्या ओबीसी में उप-वर्गीकरण होगा? क्या वंचित जातियों को नई योजनाओं का लाभ मिलेगा?
इन सवालों के जवाब 2027 के बाद मिलेंगे — लेकिन इतना तय है कि 94 साल के लंबे इंतजार के बाद, यह जनगणना भारत की सामाजिक और राजनीतिक तस्वीर को हमेशा के लिए बदल देगी।
जातिगत जनगणना न सिर्फ एक सांख्यिकीय अभ्यास है, बल्कि यह उन करोड़ों भारतीयों की पहचान का सवाल है जो दशकों से गिने जाने की मांग कर रहे थे। सवाल यह नहीं कि गिनती होगी — सवाल यह है कि गिनती के बाद न्याय होगा या नहीं।
