चिकित्सा जगत की प्रतिष्ठित पत्रिका ‘लांसेट’ में प्रकाशित एक ताजा अध्ययन ने दुनिया भर में बचपन के कैंसर (Childhood Cancer) को लेकर भयावह आंकड़े प्रस्तुत किए हैं। रिपोर्ट के अनुसार, दुनिया भर में बचपन में कैंसर से होने वाली कुल मौतों में से 94 फीसदी मौतें गरीब और मध्यम आय वाले देशों में हो रही हैं। यह आंकड़ा वैश्विक स्वास्थ्य सेवाओं में मौजूद भारी असमानता को दर्शाता है।
भारत के संदर्भ में मुख्य आंकड़े (2023):
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कुल मौतें: भारत में 2023 के दौरान करीब 17,000 बच्चों की मौत कैंसर के कारण हुई।
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वैश्विक तुलना: भारत इस सूची में शीर्ष पर है, उसके बाद चीन (16,000), नाइजीरिया (9,000) और पाकिस्तान (9,000) का स्थान है।
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मृत्यु का कारण: भारत में बच्चों की मौत का यह दसवां सबसे बड़ा कारण बन गया है।
कैंसर के प्रकार और वैश्विक प्रभाव
अध्ययन के अनुसार, साल 2023 में दुनिया भर में बच्चों में कैंसर के 3.77 लाख नए मामले सामने आए, जिनमें से 1.44 लाख बच्चों की मौत हो गई।
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ल्यूकेमिया (ब्लड कैंसर): यह बच्चों में मौत का सबसे बड़ा कारण (45,900 मौतें) पाया गया।
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मस्तिष्क और तंत्रिका तंत्र का कैंसर: 23,200 मौतों के साथ दूसरे स्थान पर।
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लिंफोमा: 15,200 मौतों के साथ तीसरा प्रमुख कारण।
इतनी अधिक मौतों के मुख्य कारण
रिपोर्ट में गरीब देशों में अधिक मौतों के पीछे निम्नलिखित कारणों को रेखांकित किया गया है:
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देर से पहचान (Delayed Diagnosis): कई मामलों में कैंसर के लक्षणों को सामान्य संक्रमण मान लिया जाता है, जिससे इलाज शुरू होने तक कैंसर एडवांस स्टेज में पहुँच जाता है।
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संसाधनों की कमी: गरीब देशों में बाल चिकित्सा कैंसर विशेषज्ञों (Pediatric Oncologists) और उन्नत मशीनों की भारी कमी है।
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इलाज का भारी खर्च: कैंसर का इलाज महंगा होने के कारण निम्न आय वर्ग के परिवार बीच में ही उपचार छोड़ देते हैं।
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जागरूकता का अभाव: माता-पिता और प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों के स्तर पर बच्चों में कैंसर के लक्षणों को लेकर समझ की कमी।
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नीतिगत प्राथमिकता: भारत सहित कई देशों में ‘राष्ट्रीय कैंसर नियंत्रण कार्यक्रम’ में बचपन के कैंसर को अभी तक वह प्राथमिकता नहीं दी गई है जो वयस्क कैंसर या अन्य संक्रामक रोगों को मिलती है।
बच्चों में कैंसर के संदर्भ में फास्ट फूड और पैक्ड फूड:
अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड और कार्सिनोजेन्स (Carcinogens)
- पैक्ड फूड (चिप्स, नूडल्स, बिस्कुट, बर्गर) को लंबे समय तक सुरक्षित रखने के लिए उनमें कई तरह के प्रिजर्वेटिव्स, कृत्रिम रंग और फ्लेवर मिलाए जाते हैं।
- कार्सिनोजेनिक तत्व: कुछ प्रोसेस्ड फूड में ऐसे रसायन होते हैं जिन्हें ‘कार्सिनोजेनिक’ (कैंसर पैदा करने वाले तत्व) की श्रेणी में रखा गया है।
- एक्रीलामाइड (Acrylamide): बहुत अधिक तापमान पर तले हुए स्टार्च वाले खाद्य पदार्थों (जैसे फ्रेंच फ्राइज़ या पैकेट वाले चिप्स) में यह केमिकल बन सकता है, जो डीएनए को नुकसान पहुँचाने की क्षमता रखता है।
कीटनाशक और रसायनों का प्रभाव:
- आजकल जंक फूड और पैक्ड फूड के उत्पादन में इस्तेमाल होने वाले कच्चे माल में कीटनाशकों का स्तर अधिक हो सकता है।
- बच्चों का शरीर अभी विकसित हो रहा होता है, इसलिए उनके अंग इन विषाक्त पदार्थों (Toxins) को बाहर निकालने में उतने सक्षम नहीं होते जितने वयस्कों के। यह धीरे-धीरे कोशिकाओं के म्यूटेशन का कारण बन सकता है।
प्लास्टिक पैकेजिंग और एंडोक्राइन व्यवधान:
- पैक्ड फूड अक्सर प्लास्टिक या माइक्रोप्लास्टिक के संपर्क में रहता है।
- BPA (Bisphenol A): प्लास्टिक कंटेनर्स या कैन में पाया जाने वाला यह रसायन हार्मोनल संतुलन बिगाड़ सकता है। चूंकि बच्चों का विकास हार्मोन्स पर निर्भर करता है, इसलिए इसमें कोई भी गड़बड़ी भविष्य में कैंसर (विशेषकर अंगों के ट्यूमर) के जोखिम को बढ़ा सकती है।
मोटापा और सूजन:
- फास्ट फूड में ‘शुगर’ और ‘बैड फैट’ (Trans-fats) की मात्रा बहुत अधिक होती है।
- मोटापा: बचपन में मोटापा शरीर में ‘क्रोनिक इन्फ्लेमेशन’ (लगातार सूजन) पैदा करता है।
- चिकित्सा विज्ञान के अनुसार, शरीर में लंबे समय तक रहने वाली सूजन कोशिकाओं के असामान्य रूप से बढ़ने का माहौल तैयार करती है, जो कैंसर की नींव रख सकती है।
पोषण की कमी:
- जब बच्चे फास्ट फूड अधिक खाते हैं, तो वे फल, सब्जियां और पोषक तत्वों से भरपूर खाना कम कर देते हैं।
- शरीर में एंटी-ऑक्सीडेंट्स (Antioxidants) की कमी हो जाती है। एंटी-ऑक्सीडेंट्स ही वह कवच हैं जो कोशिकाओं को डैमेज होने से बचाते हैं। इसकी कमी से शरीर की प्राकृतिक ‘रिपेयरिंग क्षमता’ कम हो जाती है।
सुझाव और समाधान के उपाय
इस संकट से निपटने के लिए शोधकर्ताओं और स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने निम्नलिखित उपाय सुझाए हैं:
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राष्ट्रीय कार्यक्रम में प्राथमिकता: बचपन के कैंसर को ‘राष्ट्रीय कैंसर नियंत्रण योजना’ का हिस्सा बनाकर अलग से फंड और संसाधन आवंटित किए जाएं।
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प्रारंभिक जांच केंद्रों का जाल: ब्लॉक और जिला स्तर पर ऐसी स्क्रीनिंग व्यवस्था हो जो शुरुआती लक्षणों (जैसे लगातार बुखार, हड्डियों में दर्द, अकारण गांठ) को पहचान सके।
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सस्ता और सुलभ इलाज: सरकारी अस्पतालों में कैंसर दवाओं और कीमोथेरेपी को पूरी तरह मुफ्त या बेहद सस्ता किया जाना चाहिए।
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विशेषज्ञों का प्रशिक्षण: बाल रोग विशेषज्ञों को कैंसर की पहचान के लिए विशेष प्रशिक्षण दिया जाए ताकि रेफरल प्रक्रिया तेज हो सके।
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डेटा प्रबंधन: एक मजबूत ‘पीडियाट्रिक कैंसर रजिस्ट्री’ बनाई जाए ताकि सटीक आंकड़ों के आधार पर नीतियां बनाई जा सकें।
संपादकीय टिप्पणी: लांसेट की यह रपट एक चेतावनी है। यदि समय रहते बच्चों के कैंसर को प्राथमिकता नहीं दी गई, तो यह संक्रामक बीमारियों से भी बड़ा खतरा बन सकता है। देश के भविष्य को बचाने के लिए नीतिगत सुधार अनिवार्य हैं।
