(भारत की हरित क्रांति और जलवायु संकट का वह सच जो सरकारी रिपोर्टों में नहीं मिलता)
प्रत्येक वर्ष 22 अप्रैल को दुनिया ‘Earth Day’ मनाती है — पेड़ लगाती है, संकल्प लेती है, और आगे बढ़ जाती है। लेकिन इस बार न्यूज़ ड्रिफ्ट एक सवाल लेकर आया है: क्या भारत वाकई उस हरे रास्ते पर है जिसका दावा हम करते हैं? या हम उपलब्धियों के आंकड़ों की आड़ में एक जलते हुए घर की तस्वीरें छुपा रहे हैं?
जवाब तलाशने के लिए हमने सरकारी रिपोर्टों, IRENA के आंकड़ों, CSE-Down To Earth के विश्लेषण और अंतरराष्ट्रीय शोध को एक साथ रखा। जो तस्वीर उभरी, वो उतनी सरल नहीं है — न पूरी तरह गर्व करने वाली, न पूरी तरह निराश करने वाली।
संकट का असली चेहरा — जो आंकड़े बोलते हैं
2025: भारत का ‘ईयर ऑफ फायर’
CSE और Down To Earth की रिपोर्ट Climate India 2025 एक ऐसा आंकड़ा सामने रखती है जो झकझोर देता है: जनवरी से नवंबर 2025 के बीच 334 में से 331 दिन भारत में कोई न कोई चरम मौसमी घटना दर्ज हुई। यानी लगभग 99 प्रतिशत दिन। 2022 में यह संख्या 292 थी — मात्र तीन साल में इतना उछाल।
इस बेतहाशा मौसम ने क्या किया? कम से कम 4,419 भारतीयों की जान गई, 1.74 करोड़ हेक्टेयर से अधिक फसल बर्बाद हुई, 1.81 लाख घर ध्वस्त हुए, और लगभग 77,000 जानवर मारे गए। ये केवल आधिकारिक आंकड़े हैं — असली नुकसान कहीं ज़्यादा है।
IMD के वार्षिक जलवायु विवरण के अनुसार बाढ़ और भूस्खलन ने 1,372 और बिजली गिरने ने 1,317 लोगों की जान ली। यह पहली बार हुआ जब बाढ़-संबंधी आपदाएं भारत में बिजली गिरने को मात देकर सबसे बड़ी हत्यारी बनीं।
2025 भारत का आठवां सबसे गर्म साल रहा। फरवरी 2025 तो 124 साल के रिकॉर्ड में सबसे गर्म महीना था। गोवा और महाराष्ट्र में 25 फरवरी को ही — यानी सर्दियों में — पहली लू दर्ज हो गई।
नीतियों का विरोधाभास: जब विकास, विनाश बन जाता है
एक तरफ सरकार पर्यावरण संरक्षण की बात करती है, दूसरी तरफ वन (संरक्षण) संशोधन अधिनियम 2023 और ग्रेट निकोबार मेगा प्रोजेक्ट जैसी योजनाओं में 8.5 लाख पेड़ों की बलि दी जा रही है। हिमालयी क्षेत्रों में बेतरतीब निर्माण और “पहले बनाओ, बाद में मंजूरी लो” की मानसिकता उन्हीं पहाड़ियों को खोखला कर रही है जहाँ से हमारी नदियाँ जन्म लेती हैं।
उम्मीद की किरणें — जब भारत ने दुनिया को चौंकाया
नवीकरणीय ऊर्जा: वैश्विक मंच पर भारत का नया कद
IRENA के Renewable Energy Statistics 2026 के अनुसार भारत अब वैश्विक नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता में तीसरे स्थान पर है — Brazil को पीछे छोड़कर। केवल चीन और अमेरिका ही हमसे आगे हैं।
31 मार्च 2026 तक भारत की कुल गैर-जीवाश्म ईंधन क्षमता 283.46 GW पर पहुँच गई है, जिसमें 274.68 GW नवीकरणीय ऊर्जा और 8.78 GW परमाणु ऊर्जा शामिल है। सौर ऊर्जा अकेले 150.26 GW और पवन ऊर्जा 56.09 GW पर है।
FY 2025-26 में भारत ने एक ही साल में 55.3 GW नई गैर-जीवाश्म क्षमता जोड़ी — यह किसी भी एक वर्ष में अब तक की सबसे बड़ी वृद्धि है, पिछले रिकॉर्ड 29.5 GW से लगभग दोगुनी।
जून 2025 में भारत ने एक ऐतिहासिक लक्ष्य पाँच साल पहले हासिल कर लिया: कुल स्थापित बिजली क्षमता का 50% गैर-जीवाश्म स्रोतों से। यह COP26 में तय 2030 के लक्ष्य से काफी पहले था।
पवन ऊर्जा में इस वर्ष 6.05 GW की रिकॉर्ड स्थापना हुई। PM KUSUM और रूफटॉप सोलर योजनाओं ने मिलकर 16.3 GW वितरित सौर ऊर्जा जोड़ी।
रामसर नेटवर्क: एशिया में सर्वोच्च, विश्व में तीसरा
फरवरी 2026 तक भारत में 98 रामसर साइट्स हो गई हैं — एशिया में सबसे अधिक और विश्व में UK और Mexico के बाद तीसरे स्थान पर। जनवरी 2026 में उत्तर प्रदेश का ‘पटना पक्षी विहार’ (एटा) और गुजरात का ‘छारी-धांड’ इस प्रतिष्ठित सूची में जुड़े।
उदयपुर और इंदौर भारत के — और एशिया के — पहले रामसर मान्यता प्राप्त ‘Wetland Cities’ बन चुके हैं। यह भारत की शहरी पर्यावरण नीति में एक नई परिपक्वता का प्रतीक है।
प्रोजेक्ट चीता: विश्व का पहला अंतरमहाद्वीपीय पुनर्वास प्रयोग
2022 में जब भारत ने 70 साल बाद चीतों को वापस लाने का बीड़ा उठाया, तब दुनिया ने संदेह से देखा। अप्रैल 2026 तक यह प्रयोग उम्मीद से बड़ा साबित हुआ है। भारत में अब 57 चीते हैं — 54 कूनो नेशनल पार्क में और 3 गांधीसागर अभयारण्य में। इनमें 33 शावक भारत में ही जन्मे हैं।
इससे भी ऐतिहासिक: केजीपी-2– नाम की एक भारत में जन्मी चीता ने जंगल में अपने शावकों को जन्म दिया — यह पहली बार है कि भारत में जन्मी चीता की पीढ़ी ने यहीं प्रजनन किया। यह Project Cheetah के ‘दूसरी पीढ़ी’ में प्रवेश की घोषणा है।
प्रोजेक्ट टाइगर: 50 साल, 58 रिजर्व, और एक चमत्कार
1973 में जब Project Tiger शुरू हुआ तो देश में अनुमानतः 1,800 बाघ थे। 2006 में यह संख्या घटकर 1,411 हो गई थी — एक संकट जिसने आपातकालीन संरक्षण कदम उठवाए। आज भारत में 58 टाइगर रिजर्व हैं और 2022 की गणना में 3,682 बाघ पाए गए — 2006 से 161% की वृद्धि। 2026 की गणना प्रगति पर है।
नया NDC 2035: महत्वाकांक्षा या सियासत?
भारत ने मार्च 2026 में अपना नया NDC (Nationally Determined Contribution) पेश किया। इसमें 2035 तक GDP की उत्सर्जन तीव्रता में 47% कमी और कुल बिजली क्षमता का 60% गैर-जीवाश्म स्रोतों से हासिल करने का लक्ष्य है।
लेकिन Climate Action Tracker की चेतावनी भी ध्यान देने योग्य है: भारत की तेज़ी से बढ़ती GDP के साथ ‘intensity target’ का अर्थ है कि कुल उत्सर्जन फिर भी बढ़ सकता है। भारत अपने 2030 के लक्ष्य पहले ही पार कर चुका है — अब 2035 के लक्ष्य भी 2030 से पहले पूरे हो सकते हैं। सवाल यह है: क्या हम अपनी क्षमता से कम लक्ष्य रख रहे हैं?
न्यूज़ ड्रिफ्ट का नज़रिया — दोनों सच एक साथ
भारत एक साथ दो कहानियाँ जी रहा है।
पहली कहानी: एक उभरती हरित महाशक्ति की, जिसने नवीकरणीय ऊर्जा में रिकॉर्ड तोड़े, चीतों को वापस लाया, वेटलैंड्स को बचाया, और वैश्विक जलवायु मंच पर अपनी आवाज़ बुलंद की।
दूसरी कहानी: उस देश की जहाँ 2025 में 99% दिन चरम मौसम रहा, जहाँ हर रोज़ औसतन 12 लोग जलवायु आपदाओं में मारे गए, जहाँ पहाड़ों को खोदकर सड़कें बनाई जा रही हैं और वनों को काटकर ‘विकास’ किया जा रहा है।
दोनों कहानियाँ सच हैं। और यही हमारी सबसे बड़ी चुनौती है।
न्यूज़ ड्रिफ्ट का स्पष्ट मत है: जब तक ज़मीनी स्तर पर पर्यावरण नीतियों का ईमानदार क्रियान्वयन नहीं होगा, जब तक ‘post-facto approval’ की संस्कृति नहीं टूटेगी, और जब तक विकास की परियोजनाओं में पारिस्थितिकी की कीमत नहीं जोड़ी जाएगी — तब तक हमारे 283 GW और 98 रामसर साइट्स के आंकड़े केवल अंतरराष्ट्रीय मंचों की शोभा बढ़ाएंगे।
पृथ्वी दिवस पर एक पेड़ लगाना काफी नहीं। ज़रूरत है — उन हज़ारों पेड़ों के लिए लड़ने की जो काटे जाने वाले हैं।
