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    Home»राष्ट्रीय»तमिलनाडु में राजभवन बनाम ‘थलापति’ विजय — क्या राज्यपालों की कसौटियां पार्टियों के हिसाब से बदल जाती हैं?
    तमिलनाडु में राजभवन बनाम ‘थलापति’ विजय — क्या राज्यपालों की कसौटियां पार्टियों के हिसाब से बदल जाती हैं?

    तमिलनाडु में राजभवन बनाम ‘थलापति’ विजय — क्या राज्यपालों की कसौटियां पार्टियों के हिसाब से बदल जाती हैं?

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    By News Drift on May 8, 2026 राष्ट्रीय
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    तमिलनाडु की सियासत में फिल्मी पर्दे से निकलकर सत्ता के गलियारों तक पहुंचे तमिलगा वेत्री कड़गम (TVK) के प्रमुख विजय के लिए मुख्यमंत्री की कुर्सी तक का सफर उम्मीद से कहीं अधिक चुनौतीपूर्ण साबित हो रहा है। 2026 के विधानसभा चुनाव परिणामों के बाद सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरने के बावजूद, राजभवन ने विजय की राह में एक ऐसा ‘संवैधानिक स्पीड ब्रेकर’ लगा दिया है, जिसने देश में राज्यपालों की निष्पक्षता और उनके ‘दोहरे मापदंडों’ पर एक नई बहस छेड़ दी है।

    राजभवन का ‘कठोर’ रुख: पहले गारंटी, फिर शपथ

    जब विजय कांग्रेस के समर्थन से सरकार बनाने का दावा पेश करने राज्यपाल राजेंद्र विश्वनाथ अर्लेकर से मिले, तो उन्हें तत्काल राहत की जगह एक सख्त शर्त मिली। राज्यपाल ने स्पष्ट किया कि शपथ ग्रहण से पहले उन्हें 118 विधायकों का भौतिक समर्थन पत्र (Physical Support Letter) सौंपना होगा।

    आंकड़ों का गणित:

    • TVK (विजय): 108 सीटें (सबसे बड़ी पार्टी)

    • कांग्रेस: 05 सीटें

    • कुल समर्थन: 113 सीटें

    • बहुमत का जादुई आंकड़ा: 118 (कुल 234 सीटें)

    • कमी: 05 विधायक

    राजभवन का तर्क है कि बिना बहुमत के स्पष्ट प्रमाण के किसी को शपथ दिलाना संवैधानिक जोखिम है। लेकिन सवाल यह है कि क्या इतिहास में हमेशा यही पैमाना अपनाया गया?

    फ्लैशबैक 2018: जब येदियुरप्पा को मिली थी ‘VIP छूट’

    इस घटनाक्रम ने 2018 के कर्नाटक विधानसभा चुनाव की यादें ताजा कर दी हैं। तब परिस्थितियां लगभग ऐसी ही थीं, लेकिन राजभवन का फैसला बिल्कुल उलट था।

    • कर्नाटक (2018): भाजपा 104 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी थी (बहुमत 112 से दूर)। दूसरी ओर कांग्रेस-जेडीएस गठबंधन के पास स्पष्ट बहुमत था।

    • राजभवन का फैसला: तत्कालीन राज्यपाल वजुभाई वाला ने बहुमत वाले गठबंधन को दरकिनार कर भाजपा के बी.एस. येदियुरप्पा को सरकार बनाने का न्यौता दिया।

    • विवाद: येदियुरप्पा से पहले समर्थन पत्र नहीं मांगा गया, बल्कि उन्हें ‘फ्लोर टेस्ट’ के लिए समय दिया गया। हालांकि, बहुमत न जुटा पाने के कारण उन्हें 3 दिन में इस्तीफा देना पड़ा।

    श्रेणी येदियुरप्पा (कर्नाटक 2018) विजय (तमिलनाडु 2026)
    स्थिति सबसे बड़ी पार्टी (बहुमत नहीं) सबसे बड़ी पार्टी (बहुमत के करीब)
    राज्यपाल का रुख “पहले शपथ लीजिए, बहुमत बाद में साबित करें” “पहले बहुमत का सबूत लाइये, तब शपथ होगी”
    संवैधानिक विवेकाधिकार उदार (Pro-Government) सख्त (Restricted)

    सुप्रीम कोर्ट का सिद्धांत: राजभवन बनाम विधानसभा

    भारतीय संवैधानिक इतिहास का सबसे महत्वपूर्ण फैसला एस.आर. बोम्मई बनाम भारत संघ (1994) स्पष्ट कहता है कि किसी भी सरकार के पास बहुमत है या नहीं, इसका परीक्षण राजभवन के बंद कमरों में नहीं, बल्कि विधानसभा के पटल (Floor of the House) पर होना चाहिए।

    विजय के मामले में राज्यपाल अर्लेकर का ‘राजभवन टेस्ट’ लेने का निर्णय सुप्रीम कोर्ट की उस भावना के विपरीत प्रतीत होता है, जहाँ सबसे बड़ी पार्टी को पहले मौका देने की परंपरा रही है।

    News Drift Analysis: पर्दे के पीछे की राजनीति

    विजय की राह में ये 5-6 विधायक ही सबसे बड़ी बाधा हैं। यदि वे VCK (विदुथलाई चिरुथैगल कात्ची) या अन्य छोटे दलों का समर्थन हासिल करने में विफल रहते हैं, तो तमिलनाडु एक लंबी कानूनी लड़ाई या राष्ट्रपति शासन की ओर बढ़ सकता है।

    बड़ा सवाल: क्या राज्यपालों की ‘संतुष्टि’ का पैमाना केंद्र में बैठी सत्ता के अनुकूल या प्रतिकूल होने पर बदल जाता है? कर्नाटक में जो ‘विशेष अधिकार’ येदियुरप्पा को मिला, वह तमिलनाडु में ‘थलापति’ विजय को क्यों नहीं?

    भारतीय लोकतंत्र में राज्यपाल का पद ‘संवैधानिक सेतु’ होना चाहिए, न कि राजनीतिक बाधा। अब देखना यह है कि क्या विजय 118 हस्ताक्षरों की चुनौती पार कर पाते हैं या राजभवन की यह ‘सख्ती’ तमिलनाडु की राजनीति में नए समीकरणों को जन्म देगी।

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