उत्तर प्रदेश की धार्मिक नगरी अयोध्या से एक ऐसी खबर आई है जिसने मानवता और चिकित्सा पेशे, दोनों को शर्मसार कर दिया है। एक निजी अस्पताल में डॉक्टर की अनुपस्थिति में, फोन पर दिए गए निर्देशों के आधार पर प्रसव (डिलीवरी) कराया गया, जिसका परिणाम एक मां और उसके नवजात शिशु की मौत के रूप में निकला।
घटना का विवरण: खुशियां मातम में बदलीं
बेनीगंज के निवासी सुरेश यादव ने अपनी गर्भवती पत्नी सोनी यादव को प्रसव पीड़ा होने पर शहर के परमेश्वरी देवी मेमोरियल हॉस्पिटल में भर्ती कराया था। परिवार का आरोप है कि इलाज कर रही डॉक्टर अंजलि श्रीवास्तव अस्पताल में मौजूद नहीं थीं। उन्होंने वहां मौजूद अप्रशिक्षित महिला कर्मचारियों को फोन पर निर्देश दिए और उन्हीं के जरिए प्रसव कराया गया।
प्रसव के बाद पहले नवजात को मृत घोषित किया गया और कुछ ही देर बाद मां की स्थिति बिगड़ने पर जब उसे दूसरे अस्पताल ले जाया गया, तो वहां उसे भी मृत घोषित कर दिया गया। पिछले साल अप्रैल में शादी के बंधन में बंधे इस परिवार के लिए पहले बच्चे की उम्मीदें कुछ ही घंटों में बिखर गईं।
स्वास्थ्य विभाग की जांच में चौंकाने वाले खुलासे
अपर मुख्य चिकित्सा अधिकारी (ACMO) आशुतोष श्रीवास्तव के नेतृत्व में जब स्वास्थ्य विभाग की टीम ने अस्पताल का निरीक्षण किया, तो वहां की स्थिति भयावह पाई गई:
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गायब डॉक्टर: निरीक्षण के दौरान अस्पताल में कोई भी योग्य डॉक्टर या प्रशिक्षित मेडिकल स्टाफ मौजूद नहीं था।
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अवैध संचालन: अस्पताल के रिकॉर्ड अधूरे थे और वहां काम करने वाले तथाकथित डॉक्टरों की कोई जानकारी उपलब्ध नहीं थी।
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लापरवाही की हद: अस्पताल का कचरा प्रबंधन (Waste Management) भी संतोषजनक नहीं पाया गया।
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मैनेजर ही बना डॉक्टर: जांच टीम ने पाया कि महेश सिंह नामक एक व्यक्ति, जो खुद को प्रबंधक बता रहा था, वही ऑपरेशन और मरीजों की देखरेख कर रहा था।
प्रशासन की कार्रवाई: अस्पताल सील
मामले की गंभीरता को देखते हुए स्वास्थ्य विभाग ने तत्काल प्रभाव से अस्पताल को सील कर दिया है। वहां भर्ती अन्य मरीजों को जिला महिला अस्पताल में स्थानांतरित कर दिया गया है। अधिकारियों का कहना है कि लापरवाही पूरी तरह साबित होने पर कड़ी धाराओं में प्राथमिकी (FIR) दर्ज की जाएगी।
‘न्यूज ड्रिफ्ट’ का नजरिया: क्या सिर्फ सील करना काफी है?
यह घटना केवल एक अस्पताल की लापरवाही नहीं है, बल्कि निजी स्वास्थ्य केंद्रों के उस मकड़जाल की पोल खोलती है जहाँ मरीजों की जान से ज्यादा ‘मुनाफे’ को अहमियत दी जाती है।
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टेली-मेडिसिन बनाम टेली-डिलीवरी: फोन पर परामर्श सामान्य बीमारियों के लिए तो ठीक है, लेकिन प्रसव जैसी आपातकालीन स्थिति में फोन पर निर्देश देना सीधे तौर पर आपराधिक कृत्य है।
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बिना डिग्री के अस्पताल: आखिर बिना योग्य स्टाफ और अधूरे दस्तावेजों के ऐसे अस्पताल शहर के बीचों-बीच कैसे चल रहे थे?
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प्रशासनिक जवाबदेही: क्या स्वास्थ्य विभाग सिर्फ किसी की जान जाने के बाद ही जागता है? समय-समय पर होने वाले औचक निरीक्षण कहाँ हैं?
अयोध्या की यह घटना एक चेतावनी है। अगर आज इन ‘मौत के अड्डों’ पर नकेल नहीं कसी गई, तो न जाने कितनी और सोनी यादव और उनके मासूम बच्चे तंत्र की इस लापरवाही की भेंट चढ़ते रहेंगे।
