केंद्र सरकार ने देश के ट्रांसजेंडर समुदाय के अधिकारों से जुड़े कानूनों में बड़े बदलाव की दिशा में एक कदम और बढ़ा दिया है। बुधवार को राज्यसभा ने ‘उभयलिंगी व्यक्ति (अधिकारों का संरक्षण) संशोधन विधेयक 2019’ को पारित कर दिया। मंगलवार को लोकसभा से पारित होने के बाद अब यह विधेयक कानून बनने की कगार पर है, लेकिन इसके प्रावधानों को लेकर राजनीतिक गलियारों से लेकर सड़कों तक विरोध के सुर तेज हो गए हैं।
सरकार का पक्ष: ‘मुख्यधारा में लाने की कोशिश’
सदन में चर्चा का जवाब देते हुए सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्री वीरेंद्र कुमार ने कहा कि यह संशोधन ट्रांसजेंडर व्यक्तियों को समाज की मुख्यधारा से जोड़ने और उनके प्रति होने वाले भेदभाव को समाप्त करने के लिए लाया गया है। उन्होंने तर्क दिया:
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यह विधेयक अपराध की गंभीरता के आधार पर श्रेणीबद्ध सजा (Graded Punishment) का प्रावधान करता है।
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देश के 30 से अधिक राज्यों में ट्रांसजेंडर कल्याण बोर्डों की स्थापना की जा चुकी है।
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मंत्री के अनुसार, यह कानून उन लोगों के लिए न्याय का मार्ग है जिन्होंने अपनी पहचान के कारण सदियों से सामाजिक बहिष्कार झेला है।
विपक्ष और कार्यकर्ताओं की चिंताएं: क्यों हो रहा है विरोध?
विपक्ष के कई सदस्यों ने इस विधेयक को ‘प्रतिगामी’ करार दिया और इसे गहन समीक्षा के लिए सिलेक्ट कमेटी (Select Committee) के पास भेजने की मांग की। विरोध के मुख्य बिंदु निम्नलिखित हैं:
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पहचान का अधिकार: डीएमके सांसद तिरुचि शिवा ने कड़ी आपत्ति जताते हुए कहा कि यह बिल ‘स्व-पहचान’ (Self-identification) के अधिकार को छीनता है और ट्रांसजेंडर व्यक्तियों को लिंग पहचान के लिए मेडिकल बोर्ड के सामने पेश होने को मजबूर करता है।
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अपराधीकरण का डर: आप सांसद स्वाति मालिवाल ने चेतावनी दी कि किसी को ट्रांसजेंडर के रूप में प्रस्तुत होने के लिए उकसाने या ‘बहलाने-फुसलाने’ (Alluring) को अपराध घोषित करने वाला प्रावधान बेहद अस्पष्ट है। उन्होंने कहा, “सुरक्षा के बजाय, हम डर पैदा कर रहे हैं।”
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समावेशिता पर सवाल: सीपीआई(एम) के जॉन ब्रिटास ने टिप्पणी की कि जब पूरी दुनिया अधिक समावेशी हो रही है, भारत ‘विवादास्पद और प्रतिबंधात्मक उपायों’ के साथ पीछे जा रहा है।
“गरिमा में देरी करना, गरिमा से वंचित करने के समान है। हमें इस बिल पर ट्रांसजेंडर समुदाय के साथ बड़ी चर्चा करनी चाहिए थी।” — स्वाति मालिवाल, सांसद
सड़कों पर प्रदर्शन
सदन के भीतर जब वोटिंग चल रही थी, ठीक उसी समय मुंबई के आजाद मैदान में ट्रांसजेंडर समुदाय के सदस्यों और कार्यकर्ताओं ने जमकर विरोध प्रदर्शन किया। प्रदर्शनकारियों का मानना है कि यह बिल उनकी स्वायत्तता पर हमला है और इसमें उनके वास्तविक जीवन की चुनौतियों को नजरअंदाज किया गया है।
आगे क्या?
विपक्ष की मांग थी कि बिल को मानसून सत्र तक टाला जाए, लेकिन सरकार ने इसे ध्वनि मत से पारित करा लिया। अब देखना यह होगा कि क्या यह कानून वास्तव में ट्रांसजेंडर समुदाय के जीवन में सुधार लाता है या कानूनी पेचीदगियों और सामाजिक विरोध के घेरे में ही फंसा रहता है।
