भारतीय सेना, नौसेना और वायुसेना में लैंगिक समानता की दिशा में सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को एक युगांतरकारी फैसला सुनाया है। अदालत ने सशस्त्र बलों को निर्देश दिया है कि वे पात्र महिला अधिकारियों को स्थायी कमीशन (Permanent Commission) प्रदान करें। साथ ही, कोर्ट ने उन महिला अधिकारियों के लिए पूर्ण पेंशन और संबंधित लाभों का आदेश दिया है, जिन्होंने 20 साल की सेवा पूरी कर ली है।
मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने तीन अलग-अलग लेकिन संबंधित फैसलों में सेना के मूल्यांकन के तरीके में “प्रणालीगत खामियों” (Systemic Flaws) और “संरचनात्मक पूर्वाग्रह” (Structural Bias) की कड़ी आलोचना की।
मूल्यांकन प्रक्रिया पर कोर्ट की सख्त टिप्पणी
अदालत ने पाया कि शॉर्ट सर्विस कमीशन (SSC) महिला अधिकारियों के मूल्यांकन में भारी भेदभाव किया गया था। फैसले के मुख्य बिंदु निम्नलिखित हैं:
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एनुअल कॉन्फिडेंशियल रिपोर्ट (ACR): कोर्ट ने नोट किया कि महिला अधिकारियों को योग्यता की कमी के कारण नहीं, बल्कि उनके करियर के प्रति संकीर्ण दृष्टिकोण के कारण कम ग्रेडिंग दी गई। उच्च ग्रेडिंग अक्सर पुरुष अधिकारियों के लिए आरक्षित रखी जाती थी।
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पारदर्शिता का अभाव: नौसेना के मामले में कोर्ट ने पाया कि चयन बोर्ड की बैठक से पहले महिला अधिकारियों को मूल्यांकन मानदंड और रिक्तियों की गणना का खुलासा नहीं किया गया था, जो निष्पक्षता के बुनियादी मानदंडों का उल्लंघन है।
लंबी कानूनी लड़ाई का सुखद अंत
यह फैसला 2020 के ऐतिहासिक ‘बबीता पुनिया’ और ‘एनी नागराजा’ फैसलों के बाद शुरू हुई लंबी कानूनी लड़ाई का परिणाम है।
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सेना और वायुसेना: कई महिला अधिकारियों को 2021 में एक नई नीति के तहत मूल्यांकन के बाद भी स्थायी कमीशन देने से मना कर दिया गया था, जिसे उन्होंने कोर्ट में चुनौती दी थी।
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नौसेना: नौसेना की महिला अधिकारियों ने भी मूल्यांकन मानदंड के “सील्ड कवर” (गुप्त) होने और पारदर्शिता की कमी के खिलाफ आवाज उठाई थी।
पेंशन और बकाया राशि का आदेश
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि जिन महिला अधिकारियों ने 20 साल की सेवा के आधार पर पेंशन की पात्रता हासिल कर ली है, उन्हें पूर्ण पेंशन दी जाए। कोर्ट ने यह भी निर्देश दिया है कि उनके पेंशन की गणना तदनुसार की जाए और उनके बकाया (Arrears) का भुगतान सुनिश्चित किया जाए।
क्यों महत्वपूर्ण है यह फैसला?
यह निर्णय न केवल महिला अधिकारियों को वित्तीय सुरक्षा प्रदान करता है, बल्कि सेना के भीतर उस “ग्लास सीलिंग” को भी पूरी तरह से ध्वस्त करता है जो महिलाओं को उच्च कमान की जिम्मेदारियों और करियर में आगे बढ़ने से रोकती थी। अदालत ने माना कि महिलाओं को समान अवसर न देना उनकी गरिमा और संवैधानिक अधिकारों का हनन है।
संपादन नोट: अदालत का यह रुख स्पष्ट करता है कि अब सशस्त्र बलों में करियर की प्रगति केवल मेरिट पर आधारित होगी, न कि लिंग (Gender) पर। यह ‘News Drift’ के पाठकों के लिए महिला सशक्तिकरण का एक बड़ा उदाहरण है।
