पश्चिम एशिया (West Asia) में जारी तनाव और कच्चे तेल की कीमतों में अनिश्चितता ने भारत को एक बार फिर अपनी ऊर्जा रणनीति पर पुनर्विचार करने के लिए मजबूर कर दिया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने संसद में भारत के एथेनॉल ब्लेंडिंग प्रोग्राम की सराहना करते हुए संकेत दिया है कि भारत अब एथेनॉल के उत्पादन और उपयोग में ‘ब्राजील मॉडल’ को अपनाने की ओर कदम बढ़ा सकता है।
क्यों जरूरी है एथेनॉल पर ‘गियर’ बदलना?
भारत अपनी कच्चे तेल की जरूरतों का 90% हिस्सा आयात करता है। ईरान-इजरायल तनाव के कारण सप्लाई चेन बाधित होने का खतरा हमेशा बना रहता है। ऐसे में एथेनॉल न केवल एक सस्ता विकल्प है, बल्कि यह घरेलू कृषि पर आधारित होने के कारण विदेशी मुद्रा की भी बचत करता है।
एथेनॉल क्या है
एथेनॉल एक रंगहीन, ज्वलनशील अल्कोहल है, जो मुख्य रूप से गन्ने, मक्का और सड़े आलू जैसे पौधों के बायोमास से बनता है। यह एक बायोफ्यूल है जिसे पेट्रोल में मिलाकर (एथेनॉल ब्लेंडिंग) वाहनों में इस्तेमाल किया जाता है। भारत में वर्तमान में E20 (20% एथेनॉल, 80% पेट्रोल) का उपयोग किया जा रहा है, जिससे प्रदूषण कम होता है और ईंधन की खपत कम होती है।
ब्राजील से क्या सीख सकता है भारत?
1970 के दशक के तेल संकट के दौरान ब्राजील ने अपनी रणनीति बदली थी। आज ब्राजील में:
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फ्लेक्स-फ्यूल वाहन: वहां ऐसी गाड़ियां आम हैं जो 100% हाइड्रस एथेनॉल पर चल सकती हैं।
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अनिवार्य सम्मिश्रण: पेट्रोल में एथेनॉल का न्यूनतम स्तर 25% से 27% के बीच रहता है।
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भारत की स्थिति: भारत ने 2013-14 के 38 करोड़ लीटर के मुकाबले 2024-25 में 1039 करोड़ लीटर एथेनॉल आपूर्ति का लक्ष्य छू लिया है। अब भारत का लक्ष्य पेट्रोल में 20% से बढ़ाकर 30% एथेनॉल मिश्रण (E30) की ओर बढ़ना है।
एथेनॉल आपूर्ति का बदलता गणित (Feedstock Data)
पहले एथेनॉल केवल गन्ने के शीरे (Molasses) से बनाया जाता था, लेकिन अब भारत ने इसे बहुआयामी बना दिया है:
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गन्ना और मक्का: मौजूदा आंकड़ों के अनुसार, मक्के (Maize) से एथेनॉल उत्पादन में भारी उछाल आया है। 2024-25 में मक्के से लगभग 498 करोड़ लीटर एथेनॉल उत्पादन का अनुमान है।
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चावल और खराब अनाज: भारतीय खाद्य निगम (FCI) के पास मौजूद सरप्लस चावल और खराब हो चुके अनाज का उपयोग भी एथेनॉल बनाने में तेजी से बढ़ा है।
चुनौतियां और आगे की राह
एथेनॉल की राह में अभी भी कुछ तकनीकी और नीतिगत बाधाएं हैं:
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GST का मुद्दा: वर्तमान में एथेनॉल पर 5% GST लगता है, जबकि शुद्ध पेट्रोल पर भारी वैट (VAT) और एक्साइज ड्यूटी है। उद्योग जगत की मांग है कि सभी फ्यूल ब्लेंड्स को GST के दायरे में लाया जाए।
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इंफ्रास्ट्रक्चर: भारत को ऐसी मशीनों और इंजन (Retrofitting kits) की जरूरत है जो उच्च एथेनॉल मिश्रण को झेल सकें।
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फूड बनाम फ्यूल: अनाज का उपयोग ईंधन के लिए करने पर देश की खाद्य सुरक्षा पर पड़ने वाले प्रभाव का भी बारीकी से विश्लेषण करना होगा।
| वर्ष | एथेनॉल आपूर्ति (करोड़ लीटर में) | औसत ब्लेंडिंग (%) |
| 2013-14 | 38 | 1.6% |
| 2021-22 | 434 | 10.0% |
| 2024-25 (अनुमानित) | 1039 | 15.0% – 20.0% |
यदि भारत एथेनॉल उत्पादन की अपनी इस रफ्तार को बरकरार रखता है, तो वह न केवल अपनी तेल आयात बिल में अरबों डॉलर की कटौती कर पाएगा, बल्कि किसानों की आय में भी क्रांतिकारी वृद्धि सुनिश्चित करेगा।
एथेनॉल से क्या समस्या आती है?
- इसे बनाने की प्रक्रिया में जल प्रदूषण होता है। पानी भी कई गुना लगता है। फॉसिल फ्यूल से एक गीगाजूल ईंधन की तुलना में एथेनॉल से इतना ईंधन बनाने में 78 गुना पानी लगता है।
- एक लीटर एथेनॉल बनाने में 10 से 16 लीटर विषैला बाई-प्रोडक्ट विनास निकलता है। इसे जल स्रोतों में बहाया जाता है। 1979 से 1985 तक एथेनॉल का उत्पादन 50 करोड़ लीटर से बढ़कर 1000 करोड़ लीटर सालाना हो गया था। दिसंबर 2021 तक वहां जल स्रोतों का स्तर 80% तक घट गया। 20 साल में सबसे भयावह सूखा पड़ा।
- 1 लीटर एथेनॉल में 5,130 किलो कैलोरी एनर्जी होती है, लेकिन इसमें 6.6 किलो कैलोरी एनर्जी खर्च हो जाती है। यानी बनाने में ही 22.3% एनर्जी का नुकसान। भूख मिटाने के लिए अनाज उगाना अनिवार्य है, लेकिन ईंधन बनाने के लिए अनाज उगाना विनाशकारी साबित हो सकता है।
