भारत के संसदीय इतिहास में एक युगांतरकारी परिवर्तन की आहट सुनाई दे रही है। केंद्र सरकार ने नारी शक्ति वंदन अधिनियम को हकीकत में बदलने के लिए एक नया और रणनीतिक प्रस्ताव पेश किया है। इस प्रस्ताव के तहत लोकसभा की सदस्य संख्या को 543 से बढ़ाकर 816 करने का सुझाव दिया गया है, ताकि परिसीमन (Delimitation) और महिला आरक्षण की राह में आने वाली बाधाओं को समय से पहले दूर किया जा सके।
क्या है नया प्रस्ताव? (816 सीटों का गणित)
सरकार का यह सुझाव गृह मंत्री अमित शाह और विभिन्न राजनीतिक दलों के बीच हुई बैठक में सामने आया। इसके मुख्य बिंदु निम्नलिखित हैं:
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सीटों में 50% की वृद्धि: लोकसभा और राज्यों की विधानसभाओं में सीटों की संख्या में 50% की बढ़ोतरी का प्रस्ताव है। यदि यह लागू होता है, तो लोकसभा की कुल सदस्य संख्या 816 हो जाएगी।
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महिलाओं का हिस्सा: कुल 816 सीटों में से 273 सीटें (33%) महिलाओं के लिए आरक्षित होंगी।
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2011 की जनगणना का आधार: वर्तमान कानून (106वां संविधान संशोधन) के अनुसार, आरक्षण अगली जनगणना और उसके बाद होने वाले परिसीमन के बाद ही लागू होना था। लेकिन सरकार अब इसे 2011 की जनगणना से जोड़ने (Delinking) का विचार कर रही है, ताकि 2029 के आम चुनाव तक इसे अनिवार्य रूप से लागू किया जा सके।
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राज्यों का संतुलन: सीटों की संख्या बढ़ने पर भी राज्यों के बीच मौजूदा अनुपात को यथावत रखा जाएगा, ताकि दक्षिण भारतीय राज्यों को जनसंख्या नियंत्रण के कारण कोई राजनीतिक नुकसान न हो।
भारत में महिला आरक्षण का राजनीतिक इतिहास
संसद में महिलाओं की भागीदारी का संघर्ष दशकों पुराना है। इसकी यात्रा कुछ इस प्रकार रही है:
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1993 (73वां और 74वां संशोधन): तत्कालीन प्रधानमंत्री पी.वी. नरसिम्हा राव की सरकार ने पंचायतों और नगर निकायों में महिलाओं के लिए 33% आरक्षण अनिवार्य किया। यह जमीनी स्तर पर महिला नेतृत्व की पहली बड़ी जीत थी।
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1996 (देवगौड़ा सरकार): एचडी देवगौड़ा की सरकार ने पहली बार संसद में महिला आरक्षण विधेयक पेश किया, लेकिन भारी हंगामे के कारण यह पारित नहीं हो सका।
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1998-2003 (वाजपेयी सरकार): अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार ने कई बार इस बिल को पेश करने की कोशिश की, लेकिन गठबंधन की राजनीति और आंतरिक विरोध के चलते सफलता नहीं मिली।
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2010 (मनमोहन सिंह सरकार): यूपीए शासन के दौरान राज्यसभा में यह बिल भारी बहुमत से पारित हुआ, लेकिन लोकसभा में ‘कोटे के भीतर कोटे’ (OBC आरक्षण) की मांग को लेकर राजद और सपा जैसे दलों के कड़े विरोध के कारण यह आगे नहीं बढ़ सका।
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2023 (मोदी सरकार): अंततः ‘नारी शक्ति वंदन अधिनियम’ के नाम से इसे संसद के दोनों सदनों में लगभग सर्वसम्मति से पारित किया गया।
वर्तमान स्थिति: लोकसभा में महिलाओं की भागीदारी
वर्तमान में (17वीं और 18वीं लोकसभा के दौरान), संसद में महिलाओं की स्थिति संतोषजनक नहीं रही है।
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मौजूदा संख्या: वर्तमान में महिला सांसदों की संख्या कुल सदन का लगभग 14-15% ही है।
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वैश्विक तुलना: भारत इस मामले में रवांडा (61%), क्यूबा (53%) और दक्षिण अफ्रीका (46%) जैसे देशों से काफी पीछे है।
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प्रस्तावित प्रभाव: यदि 816 सीटों वाला फॉर्मूला लागू होता है, तो संसद में महिलाओं की संख्या एक झटके में 273 तक पहुँच जाएगी, जो न केवल भारत बल्कि दुनिया की सबसे बड़ी महिला प्रतिनिधित्व वाली विधायिकाओं में से एक होगी।
निष्कर्ष: सरकार का यह नया प्रस्ताव न केवल महिला सशक्तिकरण की दिशा में एक बड़ा कदम है, बल्कि यह दक्षिण और उत्तर भारत के बीच ‘सीटों के असंतुलन’ की राजनीति को सुलझाने का भी एक प्रयास है। हालांकि, विपक्षी दलों की सहमति और संवैधानिक संशोधनों की जटिलता अभी भी एक बड़ी चुनौती है।