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    Home»खबर विशेष»इजाज़त या कूटनीतिक अपमान? इंदिरा, अटल और मनमोहन के दौर वाली ‘अडिग’ विदेश नीति बनाम आज के दावे
    इजाज़त या कूटनीतिक अपमान? इंदिरा, अटल और मनमोहन के दौर वाली ‘अडिग’ विदेश नीति बनाम आज के दावे

    इजाज़त या कूटनीतिक अपमान? इंदिरा, अटल और मनमोहन के दौर वाली ‘अडिग’ विदेश नीति बनाम आज के दावे

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    By News Drift on March 11, 2026 खबर विशेष, राष्ट्रीय
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    हाल ही में अमेरिका का यह कहना कि उसने भारत को रूस से तेल खरीदने की ‘अनुमति’ दी है, भारत की रणनीतिक स्वतंत्रता पर एक गहरा आघात है। यह सवाल उठाना लाज़मी है कि क्या ’56 इंच के सीने’ वाले दौर में हमारी विदेश नीति अमेरिका की ‘सहमति’ की मोहताज हो गई है? इतिहास गवाह है कि भारत के पूर्ववर्ती प्रधानमंत्रियों ने बिना किसी शोर-शराबे के अमेरिका जैसे देशों को उनकी औकात दिखाई है।

    1. इंदिरा गांधी: फौलादी इरादों वाली कूटनीति

    भारत के इतिहास में इंदिरा गांधी जैसी निडर छवि आज भी मिसाल है।

    • पीएल-480 गेहूं विवाद: एक दौर था जब अमेरिका भारत को घटिया दर्जे का गेहूं भेजकर अपनी शर्तें मनवाना चाहता था। इंदिरा गांधी ने न केवल उस खराब गेहूं को ठुकराया, बल्कि उसी अपमान को ‘हरित क्रांति’ (Green Revolution) का आधार बना दिया ताकि भारत आत्मनिर्भर हो सके।

    • मूंहतोड़ जवाब: 1971 में रिचर्ड निक्सन की धमकियों और अमेरिकी ‘सातवें बेड़े’ की तैनाती के बावजूद उन्होंने बांग्लादेश को आज़ाद कराया। यह ’56 इंच’ नहीं, बल्कि फौलादी इरादों वाली कूटनीति थी।

    2. अटल बिहारी वाजपेयी: प्रतिबंधों को दिखाया ठेंगा

    1998 में जब अटल जी ने पोखरण में परमाणु परीक्षण किया, तो अमेरिका तिलमिला उठा था।

    • सीधे चुनौती: अमेरिका ने भारत पर कड़े आर्थिक प्रतिबंध लगाए और पूरी दुनिया में अलग-थलग करने की कोशिश की। लेकिन अटल जी ने बिना डरे स्पष्ट कर दिया कि भारत अपनी सुरक्षा के लिए किसी भी देश के आगे नहीं झुकेगा।

    • नतीजा: अंततः अमेरिका को ही झुकना पड़ा और भारत एक घोषित परमाणु शक्ति बनकर उभरा।

    3. डॉ. मनमोहन सिंह: शांत रहकर दी चुनौती

    मनमोहन सिंह को अक्सर ‘मौन’ कहा जाता था, लेकिन कूटनीति की मेज पर वे किसी भी चट्टान से ज्यादा मजबूत थे।

    • न्यूक्लियर डील (2008): भारत-अमेरिका परमाणु समझौते के समय अमेरिका चाहता था कि भारत अपनी संप्रभुता से समझौता करे, लेकिन मनमोहन सिंह ने इसे भारतीय शर्तों पर ही साइन किया। उन्होंने अपनी सरकार गिरने का जोखिम उठाया, वामपंथियों का समर्थन खोया, लेकिन देश के रणनीतिक हितों को अमेरिका के पास गिरवी नहीं रखा।

    4. 2026 का सच: बड़बोलापन बनाम हकीकत

    आज जब सरकार ‘विश्वगुरु’ होने का दावा करती है, तब अमेरिका का यह कहना कि वह हमें रूस से तेल खरीदने की ‘इजाजत’ दे रहा है, एक कड़वा सच बयां करता है।

    • रणनीतिक स्वतंत्रता पर ग्रहण: 11 मार्च 2026 के वैश्विक हालात में, यदि भारत को अपनी ऊर्जा सुरक्षा के लिए अमेरिका के ‘कम्फर्ट लेटर’ या ‘छूट’ (Waiver) का इंतज़ार करना पड़ रहा है, तो यह हमारी स्वायत्तता पर सवाल है।

    • निष्कर्ष: असली मजबूती इंदिरा की तरह ‘ना’ कहने में है, अटल की तरह प्रतिबंध झेलकर मुस्कुराने में है, और मनमोहन की तरह चुप रहकर अपनी शर्तें मनवाने में है। केवल प्रचार और बड़बोलेपन से विदेश नीति मजबूत नहीं होती।


    न्यूज़ ड्रिफ्ट का विश्लेषण:

    रूस से तेल खरीदना भारत की संप्रभुता का हिस्सा है, कोई ‘फेवर’ नहीं। यदि अमेरिका इसे अपनी ‘इजाजत’ बता रहा है और भारत सरकार उन दावों का खंडन भी नहीं कर रही तो यह भारत के वर्तमान नेतृत्व की वैश्विक पकड़ और दबाव झेलने की क्षमता पर एक बड़ा प्रश्नचिह्न है।

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