केंद्र सरकार ने दावा किया है कि गंगा नदी का पानी अब अधिकांश स्थानों पर ‘स्नान करने योग्य’ (Bathing Quality) हो गया है। लोकसभा में एक लिखित प्रश्न के उत्तर में जल शक्ति राज्य मंत्री राज भूषण चौधरी ने बताया कि नदी के प्रदूषण स्तर में निरंतर कमी आ रही है। यह रिपोर्ट जनवरी से अगस्त 2025 के बीच एकत्र किए गए औसत जल गुणवत्ता आंकड़ों पर आधारित है।
प्रमुख सरकारी दावे: आंकड़ों की जुबानी
मंत्री के बयान के अनुसार, गंगा की सफाई के लिए चलाए जा रहे अभियानों का असर दिखने लगा है। रिपोर्ट के मुख्य बिंदु निम्नलिखित हैं:
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मानकों पर खरा उतरता जल: केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) द्वारा 5 राज्यों के कुल 112 स्थानों पर निगरानी की जा रही है। इनमें उत्तराखंड (19), उत्तर प्रदेश (41), बिहार (33), झारखंड (4) और पश्चिम बंगाल (15) शामिल हैं। अधिकांश जगहों पर जल का pH स्तर और घुलित ऑक्सीजन (DO) नहाने के मानकों को पूरा करते हैं।
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परियोजनाओं की स्थिति: फरवरी 2026 तक कुल 524 परियोजनाओं को 43,030 करोड़ रुपये की लागत से मंजूरी दी गई है, जिनमें से 355 पूरी हो चुकी हैं। इसमें सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट (STP) की 138 परियोजनाएं भी शामिल हैं, जो चालू हो चुकी हैं।
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जलीय जीवों की वापसी: जल की गुणवत्ता सुधरने से डॉल्फिन, ऊदबिलाव, कछुए और घड़ियाल जैसी प्रजातियों की संख्या में वृद्धि दर्ज की गई है।
उत्तर प्रदेश के इन हिस्सों में अभी भी चुनौती बरकरार
हालांकि रिपोर्ट में सुधार की बात कही गई है, लेकिन उत्तर प्रदेश के कुछ संवेदनशील इलाकों में अब भी जल गुणवत्ता मानकों पर खरी नहीं उतरी है। मंत्री ने स्पष्ट किया कि:
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फर्रुखाबाद से कानपुर (पुराना राजापुर तक), रायबरेली के डलमऊ और गाजीपुर के ताड़ीघाट जैसे क्षेत्रों में स्थिति अब भी चिंताजनक बनी हुई है।
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मिर्जापुर के निचले हिस्सों में भी पानी पूरी तरह मानकों के अनुरूप नहीं पाया गया है।
औद्योगिक प्रदूषण पर प्रहार
औद्योगिक कचरे को रोकने के लिए तीन बड़े सामान्य अपशिष्ट उपचार संयंत्र (CETP) स्वीकृत किए गए थे:
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जाजमऊ (कानपुर): 20 एमएलडी क्षमता
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बंथर: 4.5 एमएलडी क्षमता
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मथुरा: 6.25 एमएलडी क्षमता इनमें से दो संयंत्रों का काम पूरा हो चुका है, जिससे गंगा में सीधे गिरने वाले औद्योगिक कचरे में कमी आई है।
‘न्यूज ड्रिफ्ट’ विश्लेषण: विजन 2026 और जमीनी हकीकत
सरकार के आंकड़ों के अनुसार जैव-निगरानी (Bio-monitoring) से पता चलता है कि जल की गुणवत्ता ‘अच्छी’ से ‘मध्यम’ श्रेणी में है। 43,000 करोड़ रुपये का भारी-भरकम निवेश निश्चित रूप से बुनियादी ढांचे (STP और ड्रेनेज) को मजबूत कर रहा है।
लेकिन, चुनौती सिर्फ इंफ्रास्ट्रक्चर की नहीं बल्कि ‘निरंतरता’ की है। उत्तर प्रदेश के औद्योगिक बेल्ट (विशेषकर कानपुर और गाजीपुर) में अभी भी मानकों का उल्लंघन होना यह संकेत देता है कि निगरानी तंत्र को और अधिक सख्त करने की आवश्यकता है। जलीय जीवों की बढ़ती संख्या एक सकारात्मक संकेत है, लेकिन आम जनमानस के लिए गंगा को ‘आचमन योग्य’ बनाना अभी भी एक लंबी यात्रा है।
