क्या एक शादीशुदा व्यक्ति किसी और के साथ लिव-इन में रह सकता है? क्या अदालत ऐसे जोड़ों को सुरक्षा देने के लिए बाध्य है? हाल ही में इलाहाबाद उच्च न्यायालय के दो अलग-अलग फैसलों ने इन सवालों पर एक नई कानूनी और सामाजिक बहस छेड़ दी है।
सतही तौर पर देखने पर ये दोनों फैसले एक-दूसरे के विपरीत लग सकते हैं, लेकिन कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि ‘मामले के संदर्भ’ (Context) ने यहाँ सारा खेल बदल दिया है।
दो मामले, दो अलग मोड़
1. सुरक्षा देने से इनकार: ‘तलाक के बिना रहना अवैध’ न्यायमूर्ति विवेक कुमार सिंह की पीठ ने एक मामले में कड़ा रुख अपनाते हुए कहा कि यदि कोई विवाहित व्यक्ति अपने जीवनसाथी को तलाक दिए बिना किसी और के साथ लिव-इन में रहता है, तो उसे कानूनी मान्यता नहीं दी जा सकती। अदालत ने जोड़ों को पुलिस सुरक्षा देने से यह कहते हुए मना कर दिया कि ऐसे संबंध सामाजिक और कानूनी ताने-बाने के खिलाफ हैं।
2. निजी स्वतंत्रता का सम्मान: ‘सहमति है तो अपराध नहीं’ इसके ठीक उलट, न्यायमूर्ति जेजे मुनीर और न्यायमूर्ति तरुण सक्सेना की पीठ ने एक अन्य मामले में कहा कि “यदि एक शादीशुदा व्यक्ति किसी वयस्क महिला के साथ उसकी सहमति से रहता है, तो यह अपराध नहीं है।” अदालत ने याचिकाकर्ताओं की गिरफ्तारी पर रोक लगाते हुए उनकी निजी स्वतंत्रता को प्राथमिकता दी।
विशेषज्ञों की राय: क्या है असली पेंच?
इलाहाबाद उच्च न्यायालय बार एसोसिएशन के अध्यक्ष राकेश पांडे के अनुसार, इन दोनों फैसलों के बीच का अंतर ‘मांगी गई राहत’ और ‘परिस्थितियों’ में छिपा है:
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प्राथमिकी (FIR) बनाम सुरक्षा: एक मामले में मुद्दा केवल पुलिस सुरक्षा का था, जहाँ अदालत ने इसे व्यावहारिक नहीं माना। वहीं दूसरे मामले में, याचिकाकर्ताओं के खिलाफ FIR दर्ज की गई थी। वहाँ अदालत ने स्पष्ट किया कि दो वयस्कों का साथ रहना ‘अपराध’ की श्रेणी में नहीं आता, जब तक कि वे दूसरी शादी (Bigamy) न कर लें।
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धारा 494 और 495 का खेल: भारतीय न्याय संहिता के तहत बिना तलाक दूसरी शादी करना अपराध है, लेकिन ‘साथ रहना’ (Co-habitation) तकनीकी रूप से तब तक अपराध नहीं है जब तक कि विवाह का दावा न किया जाए।
न्यूज़ ड्रिफ्ट टेक (News Drift Take)
यह पूरी बहस व्यक्तिगत स्वतंत्रता और सामाजिक नैतिकता के बीच के पुराने टकराव को दर्शाती है। जहाँ एक तरफ भारतीय कानून वयस्कों की पसंद का सम्मान करता है, वहीं दूसरी तरफ ‘विवाह’ जैसी संस्था को बचाने की कोशिश भी करता है।
अदालतों के ये अलग-अलग रुख यह साफ करते हैं कि लिव-इन संबंधों पर अभी भी कोई एक ‘पत्थर की लकीर’ वाला कानून नहीं है। हर फैसला मामले की गंभीरता, याचिकाकर्ता की मांग और जज के कानूनी नजरिए पर निर्भर करता है।
निष्कर्ष: यदि आप वयस्क हैं और अपनी मर्जी से साथ रह रहे हैं, तो आप अपराधी नहीं हैं। लेकिन, यदि आप कानूनी सुरक्षा की उम्मीद कर रहे हैं, तो आपकी वैवाहिक स्थिति और आपके खिलाफ दर्ज शिकायतों का आधार कोर्ट के रुख को पूरी तरह बदल सकता है।
