इतिहास गवाह है कि एक व्यक्ति की हठधर्मिता पूरे विश्व को विनाश के कगार पर ला सकती है। आज, 2026 में हम जिस दुनिया में जी रहे हैं, वह पहले से कहीं अधिक असुरक्षित, महंगी और अस्थिर है। वाशिंगटन की गद्दी पर बैठे ‘स्वघोषित’ रक्षक के फैसलों ने मानवता को युद्ध, महंगाई और अभाव के एक ऐसे दुष्चक्र में धकेल दिया है, जिससे निकलने का रास्ता फिलहाल नजर नहीं आ रहा।
भारत के साथ ‘टैरिफ वॉर’ और कूटनीतिक बदजुबानी
ट्रम्प के इस कार्यकाल में भारत के साथ संबंधों में एक अजीब विरोधाभास देखा गया। जहाँ एक तरफ वे भारत को अपना ‘दोस्त’ कहते हैं, वहीं दूसरी ओर व्यापारिक मोर्चे पर उन्होंने भारत के खिलाफ एक अघोषित युद्ध छेड़ रखा है।
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दंडात्मक टैरिफ: अमेरिका ने भारतीय स्टील, एल्युमीनियम और आईटी सेवाओं पर भारी आयात शुल्क (Tariff) लगाकर भारतीय निर्यातकों की कमर तोड़ दी है।
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गलत बयानबाजी: सार्वजनिक मंचों से भारत को “टैरिफ किंग” कहना और भारतीय प्रदूषण व व्यापारिक नीतियों पर अपमानजनक टिप्पणी करना अब व्हाइट हाउस की नई दिनचर्या बन गई है। यह न केवल कूटनीतिक शिष्टाचार के खिलाफ है, बल्कि दो लोकतांत्रिक देशों के विश्वास को भी गहरी चोट पहुँचाता है।
- भारत और पाकिस्तान के युद्ध में खुद को शान्ति दूत बताना हो या रूस से तेल खरीदने की परमीशन देने जैसे बातों को बोलते हुए लिखना और प्रेस कांफ्रेंस करना हो , इस अमेरिकी राष्ट्रपति की सनक और अस्थिर नीतियां वैश्विक आपदा बन गयीं हैं।
ग्रीनलैंड से वेनेजुएला तक: एक ‘कॉलोनियल’ मानसिकता
ट्रम्प की विस्तारवादी नीतियों ने आधुनिक संप्रभुता के सिद्धांतों को पैरों तले रौंद दिया है।
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ग्रीनलैंड की धमकी: एक संप्रभु राष्ट्र (डेनमार्क) को उसके हिस्से को बेचने के लिए मजबूर करना और मना करने पर सैन्य कार्रवाई या आर्थिक घेराबंदी की धमकी देना किसी ‘रियल एस्टेट माफिया’ जैसी सोच को दर्शाता है।
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वेनेजुएला में तख्तापलट: तेल के संसाधनों पर कब्जा करने के लिए वेनेजुएला के नेता का अपहरण और वहां एक कठपुतली सरकार बिठाने की कोशिश ने लैटिन अमेरिका को गृहयुद्ध की आग में झोंक दिया है।
यूक्रेन और यूरोप के साथ विश्वासघात
यूक्रेन संकट में ट्रम्प की ‘यू-टर्न’ नीति ने पुतिन के हौसले बुलंद कर दिए हैं। नाटो (NATO) को “बेकार” बताकर और यूरोपीय सहयोगियों को धमकी देकर उन्होंने पश्चिम की सामूहिक सुरक्षा व्यवस्था को छिन्न-भिन्न कर दिया है। आज यूक्रेन अकेला खड़ा है, और यूरोप इस डर में है कि अगला नंबर उनका हो सकता है।
वैश्विक महंगाई और अभाव का दौर
ट्रम्प के ‘यूनिवर्सल ट्रेड वॉर’ का सबसे बुरा असर आम आदमी की जेब पर पड़ा है।
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सप्लाई चेन की तबाही: चीन और भारत जैसे देशों के साथ व्यापार युद्ध के कारण दुनिया भर में कच्चे माल की कमी हो गई है।
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महंगाई का तांडव: अमेरिका में खुद महंगाई दर पिछले कई दशकों के रिकॉर्ड तोड़ रही है, जिससे वैश्विक स्तर पर वस्तुओं के दाम आसमान छू रहे हैं। भोजन से लेकर ईंधन तक, सब कुछ आम आदमी की पहुँच से बाहर होता जा रहा है।
अमेरिका पर क्या होगा प्रभाव?
यह सोचना गलत होगा कि इस आग में केवल बाकी दुनिया जल रही है। खुद अमेरिका भी विनाश की ओर बढ़ रहा है:
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वैश्विक अलगाव: अमेरिका ने अपने दशकों पुराने भरोसेमंद सहयोगियों को खो दिया है। डॉलर का दबदबा (De-dollarization) तेजी से कम हो रहा है क्योंकि देश अब वैकल्पिक मुद्राओं की तलाश कर रहे हैं।
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आंतरिक विभाजन: ट्रम्प की नीतियों ने अमेरिका के भीतर भी सामाजिक विद्वेष और राजनीतिक अस्थिरता को चरम पर पहुँचा दिया है।
एक विनाशकारी भविष्य की आहट
30 मार्च 2026 की स्थिति यह है कि दुनिया एक ‘परमाणु बारूद’ के ढेर पर बैठी है, जिसकी माचिस एक ऐसे व्यक्ति के हाथ में है जो कूटनीति से ज्यादा धमकियों पर भरोसा करता है। यदि समय रहते वैश्विक शक्तियों ने इस ‘सनक’ पर लगाम नहीं लगाई, तो यह युग युद्ध और अभाव के ऐसे दौर के रूप में याद किया जाएगा जिसने दशकों की प्रगति को मिट्टी में मिला दिया।
