सांख्यिकी और कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय (MoSPI) द्वारा जारी पीरियोडिक लेबर फोर्स सर्वे (PLFS) के हालिया आंकड़ों ने भारतीय श्रम बाजार की एक नई और सकारात्मक तस्वीर पेश की है। रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2025 में कार्यबल की सभी श्रेणियों में महिलाओं की आय में वृद्धि की दर पुरुषों की तुलना में बेहतर रही है।
वेतन वृद्धि के आंकड़े: एक तुलनात्मक अध्ययन
PLFS की डेटा रिपोर्ट से पता चलता है कि महिलाओं ने वेतन वृद्धि (Wage Growth) के मामले में पुरुषों को पीछे छोड़ दिया है:
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सैलरीड जॉब्स (वेतनभोगी): महिलाओं की आय में 7.2% की वृद्धि हुई, जबकि पुरुषों के लिए यह आंकड़ा 5.8% रहा।
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स्वरोजगार (Self-employment): इस क्षेत्र में महिलाओं की आय 8.8% बढ़ी, जो पुरुषों की 8.0% वृद्धि से अधिक है।
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दिहाड़ी मजदूरी (Casual Labour): यहाँ सबसे बड़ा अंतर देखा गया, जहाँ महिलाओं की आय में 5.4% की वृद्धि हुई, जबकि पुरुषों की आय में 0.2% की मामूली गिरावट दर्ज की गई।
लैंगिक आय असमानता (Gender Pay Gap) की चुनौती
हालांकि आय वृद्धि की दर सकारात्मक है, लेकिन बुनियादी आय में लैंगिक असमानता अभी भी एक बड़ी चुनौती बनी हुई है। रिपोर्ट के मुख्य बिंदु निम्नलिखित हैं:
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वेतन का अंतर: सैलरीड जॉब्स में महिलाएं आज भी पुरुषों की तुलना में केवल 76% ही कमा पाती हैं।
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स्वरोजगार में स्थिति: इस श्रेणी में स्थिति और भी चिंताजनक है, जहाँ महिलाएं पुरुषों की कमाई का मात्र 36% ही अर्जित कर रही हैं।
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सकारात्मक बदलाव: दिहाड़ी मजदूरी में सुधार देखा गया है, जहाँ यह अंतर 66% से सुधरकर 69% पर पहुँच गया है।
रोजगार के बदलते पैटर्न और बेरोजगारी दर
रोजगार की गुणवत्ता के मामले में भी कुछ महत्वपूर्ण बदलाव देखे गए हैं:
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सैलरीड जॉब्स की हिस्सेदारी: अखिल भारतीय स्तर पर वेतनभोगी नौकरियों का अनुपात 2024 के 22.4% से बढ़कर 2025 में 23.6% हो गया है।
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बेरोजगारी में कमी: ग्रामीण बेरोजगारी दर घटकर 2.4% और शहरी बेरोजगारी दर 4.8% पर आ गई है।
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युवा बेरोजगारी: युवाओं के बीच बेरोजगारी दर में सुधार हुआ है और यह 9.9% पर आ गई है, हालांकि युवा महिलाओं के बीच यह अभी भी 11.3% के उच्च स्तर पर है।
News Drift की विशेष टिप्पणी
MoSPI के ये आंकड़े बताते हैं कि भारतीय अर्थव्यवस्था धीरे-धीरे समावेशी विकास की ओर बढ़ रही है। महिलाओं की आय में तेज वृद्धि यह दर्शाती है कि कार्यबल में उनकी भूमिका और उत्पादकता को अब बेहतर पहचान मिल रही है। हालांकि, स्वरोजगार और वेतन स्तर पर जो गहरी खाई है, उसे पाटने के लिए अभी नीतिगत स्तर पर और अधिक प्रयासों की आवश्यकता है।
