भारत के कानूनी और चिकित्सा इतिहास में मार्च 2026 का महीना एक युगांतरकारी मोड़ के रूप में दर्ज हो गया है। 24 मार्च 2026 को एम्स (AIIMS), दिल्ली में 32 वर्षीय हरीश राणा की मृत्यु के साथ ही देश में ‘पैसिव यूथेनेशिया’ (Passive Euthanasia) का पहला वास्तविक मामला संपन्न हुआ। यह केवल एक मृत्यु नहीं, बल्कि 2018 के ऐतिहासिक ‘कॉमन कॉज’ फैसले का जमीन पर पहला क्रियान्वयन है।
13 साल का संघर्ष और सुप्रीम कोर्ट का हस्तक्षेप
हरीश राणा, जो 2013 में चंडीगढ़ में एक इमारत की चौथी मंजिल से गिरने के बाद ‘परसिस्टेंट वेजिटेटिव स्टेट’ (PVS) में चले गए थे, पिछले 13 वर्षों से बिस्तर पर थे। उनके माता-पिता ने अपने बेटे को इस असहनीय पीड़ा से मुक्ति दिलाने के लिए लंबी कानूनी लड़ाई लड़ी।
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11 मार्च 2026: सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस के.वी. विश्वनाथन की पीठ ने हरीश राणा को पैसिव यूथेनेशिया (चिकित्सीय सहायता बंद करने) की अनुमति दी।
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तथ्य: कोर्ट ने माना कि जब रिकवरी की कोई गुंजाइश न हो, तो केवल मशीनों के सहारे जीवन खींचना ‘अनुच्छेद 21’ (गरिमा के साथ जीने का अधिकार) का उल्लंघन है।
एक्टिव बनाम पैसिव यूथेनेशिया: अंतर समझना जरूरी
भारत में आज भी ‘एक्टिव यूथेनेशिया’ (Active Euthanasia) पूरी तरह प्रतिबंधित है। लेख के इस हिस्से में हम दोनों के बीच के महीन अंतर को स्पष्ट कर रहे हैं:
| श्रेणी | विवरण | भारत में स्थिति |
| एक्टिव यूथेनेशिया | घातक इंजेक्शन या दवा देकर सीधे तौर पर मृत्यु कारित करना। | अवैध (हत्या/आपराधिक मानव वध माना जाता है) |
| पैसिव यूथेनेशिया | जीवन रक्षक प्रणाली (जैसे वेंटिलेटर या फीडिंग ट्यूब) को हटा लेना ताकि प्राकृतिक मृत्यु हो सके। | वैध (सुप्रीम कोर्ट की गाइडलाइंस के तहत) |
कैसे हुआ क्रियान्वयन?
सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद हरीश को उनके गाजियाबाद स्थित आवास से 14 मार्च को एम्स के ‘पैलिएटिव केयर यूनिट’ में शिफ्ट किया गया। यहाँ विशेषज्ञों की एक टीम (न्यूरोसर्जरी, एनेस्थीसिया और मनोरोग विशेषज्ञ) ने प्रक्रिया की निगरानी की:
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CANH का हटाया जाना: कोर्ट ने ‘क्लिनिकली असिस्टेड न्यूट्रिशन एंड हाइड्रेशन’ (CANH) यानी फीडिंग ट्यूब हटाने की अनुमति दी।
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मानवीय दृष्टिकोण: डॉक्टरों ने सुनिश्चित किया कि ट्यूब हटाने के दौरान मरीज को कोई शारीरिक कष्ट न हो।
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24 मार्च 2026: अंततः हरीश राणा ने अंतिम सांस ली, जिससे भारत में न्यायिक अनुमति से होने वाली यह पहली ‘डिग्निफाइड डेथ’ बनी।
तथ्यात्मक विश्लेषण: क्या बदल गया?
इस मामले ने भारत में ‘लिविंग विल’ (Living Will) और ‘एडवांस मेडिकल डायरेक्टिव’ की महत्ता को फिर से चर्चा में ला दिया है।
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लिविंग विल की कमी: हरीश राणा के पास कोई ‘लिविंग विल’ नहीं थी, जिसके कारण परिवार को वर्षों तक अदालतों के चक्कर काटने पड़े।
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ABHA कार्ड का लिंक: सरकार अब नागरिकों को प्रोत्साहित कर रही है कि वे अपनी ‘लिविंग विल’ को अपने आयुष्मान भारत डिजिटल हेल्थ अकाउंट (ABHA) से लिंक करें, ताकि भविष्य में ऐसी स्थिति आने पर अस्पताल तुरंत फैसला ले सकें।
निष्कर्ष: कानून और करुणा का संगम
हरीश राणा का मामला केवल कानूनी मिसाल नहीं है, बल्कि यह चिकित्सा नैतिकता (Medical Ethics) और मानवीय संवेदनाओं का संगम है। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि “किसी को मरने देना” और “किसी को मारना” दो अलग बातें हैं। जहाँ उम्मीद खत्म हो जाए, वहाँ गरिमा को बचाए रखना ही न्याय है।
