अयोध्या: श्री राम जन्मभूमि मंदिर में भक्ति और आध्यात्मिकता का एक नया अध्याय जुड़ गया है। गुरुवार को एक भव्य समारोह के बीच मंदिर के दूसरे तल पर ‘श्री राम यंत्र’ को विधि-विधान के साथ स्थापित किया गया। इस ऐतिहासिक अवसर पर राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू, उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और राज्यपाल आनंदीबेन पटेल सहित कई गणमान्य नागरिक उपस्थित रहे।
क्या है श्री राम यंत्र और इसकी बनावट?
यह यंत्र केवल एक धातु की संरचना नहीं, बल्कि शिल्प शास्त्र और वैदिक विज्ञान का एक अद्भुत संगम है। इसकी मुख्य विशेषताएं इस प्रकार हैं:
-
धातु और भार: इस यंत्र का निर्माण ‘पंचधातु’ (पाँच पवित्र धातुओं के मिश्रण) से किया गया है, जिस पर 24-कैरेट सोने की परत चढ़ाई गई है। इसका कुल वजन लगभग 150 किलोग्राम है।
-
आकार: यह यंत्र 3-बाय-3 फीट के वर्गाकार आकार में फैला हुआ है।
-
नक्काशी: इस पर सूक्ष्म त्रिकोण, जटिल ज्यामितीय पैटर्न और संकेंद्रित वृत्त (concentric circles) बने हुए हैं, जो पारंपरिक शिल्प शास्त्र के सिद्धांतों पर आधारित हैं।
-
पवित्र मंत्र: यंत्र की संरचना में देवनागरी लिपि में संस्कृत की प्रार्थनाएं अंकित हैं, जो भगवान राम को मंदिर में स्थायी रूप से निवास करने का निमंत्रण देती हैं।
धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व
हिंदू परंपरा में ‘यंत्र’ को ब्रह्मांडीय शक्तियों का एक आध्यात्मिक ब्लूप्रिंट माना जाता है।
-
दिव्य ऊर्जा का केंद्र: माना जाता है कि यंत्र की ज्यामितीय आकृतियाँ दिव्य ऊर्जा के चैनल के रूप में कार्य करती हैं, जिससे मंदिर के भीतर एक सकारात्मक और शांतिपूर्ण वातावरण बना रहता है।
-
संरक्षण की शक्ति: यह यंत्र न केवल भगवान राम के आशीर्वाद का प्रतीक है, बल्कि इसमें भगवान हनुमान का भी आह्वान किया गया है, ताकि वे इस पवित्र स्थान की नकारात्मक शक्तियों से रक्षा करें।
-
प्राचीन परंपरा: इस यंत्र को कांचीपुरम के एक प्राचीन मंदिर में स्थित राम यंत्र की तर्ज पर बनाया गया है, जो सदियों पुरानी आध्यात्मिक निरंतरता को दर्शाता है।
कांचीपुरम से अयोध्या तक का सफर
इस यंत्र की यात्रा भी काफी विशेष रही है। इसे कांची कामकोटि पीठम के जगद्गुरु श्री शंकर विजयेन्द्र सरस्वती के मार्गदर्शन में कांचीपुरम में प्रतिष्ठित किया गया था। वहां से इसे एक भव्य ‘रथ यात्रा’ के माध्यम से दिसंबर 2024 में अयोध्या लाया गया था।
अब, मंदिर के दूसरे तल का निर्माण कार्य पूर्ण होने के बाद, इसे इसके स्थायी स्थान यानी ‘गर्भगृह’ के ठीक ऊपर दूसरे तल पर स्थापित कर दिया गया है। ट्रस्ट के कोषाध्यक्ष स्वामी गोविंद गिरी महाराज के अनुसार, यह स्थापना एक लंबे समय से प्रतीक्षित प्रक्रिया का समापन है।
