पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष अब केवल सैन्य मोर्चे तक सीमित नहीं रहा है। इसका असर पर्यावरण और आम नागरिकों के स्वास्थ्य पर भी दिखाई देने लगा है। हाल के दिनों में ईरान की राजधानी तेहरान में हुई तथाकथित “काली बारिश” (Black Rain) ने दुनिया भर के वैज्ञानिकों और स्वास्थ्य विशेषज्ञों को चिंतित कर दिया है।
मार्च 2026 की शुरुआत में हुए हवाई हमलों के बाद तेहरान और आसपास के क्षेत्रों में ऐसी बारिश दर्ज की गई, जिसमें तेल और रासायनिक कणों से भरी काली बूंदें गिरती दिखाई दीं। यह घटना युद्ध के पर्यावरणीय दुष्प्रभावों का एक गंभीर उदाहरण मानी जा रही है।
कैसे हुई ‘काली बारिश’ की शुरुआत
7 मार्च 2026 की रात इज़राइल द्वारा ईरान के कई तेल भंडारण और तेल उत्पादन केंद्रों पर हवाई हमले किए गए। इन हमलों में तेहरान और अलबोर्ज प्रांत के चार प्रमुख तेल भंडारण सुविधाओं और एक तेल ट्रांसफर केंद्र को निशाना बनाया गया।
इन हमलों के बाद बड़े पैमाने पर आग लगी, जो कई घंटों तक जलती रही। आग से उठने वाले धुएँ और रासायनिक गैसों ने वातावरण को प्रदूषित कर दिया।
जब कुछ दिनों बाद बारिश हुई तो यह प्रदूषित कण पानी के साथ मिलकर जमीन पर गिरे, जिससे बारिश की बूंदें काली और तैलीय दिखाई दीं। यही घटना “ब्लैक रेन” या काली बारिश के रूप में सामने आई।
वैज्ञानिकों के अनुसार कैसे बनती है काली बारिश
वैज्ञानिकों के अनुसार विस्फोट और आग के कारण वातावरण में बड़ी मात्रा में विषैले रसायन फैल गए, जिनमें मुख्य रूप से शामिल हैं—
-
हाइड्रोकार्बन
-
सल्फर ऑक्साइड
-
नाइट्रोजन ऑक्साइड
-
तेल और धुएँ के सूक्ष्म कण
ये कण हवा में तैरते रहते हैं। जब बादल बनते हैं और बारिश शुरू होती है, तो ये कण पानी की बूंदों में मिल जाते हैं। इसके कारण बारिश का पानी काला या तैलीय दिखाई देता है।
ऐसी बारिश सामान्य वर्षा की तुलना में अधिक खतरनाक होती है क्योंकि इसमें रासायनिक प्रदूषण शामिल होता है।
‘ब्लैक रेन’ का इतिहास
काली बारिश की घटनाएँ पहले भी दुनिया में दर्ज की गई हैं।
हिरोशिमा और नागासाकी (1945)
द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान परमाणु बम गिरने के बाद जापान के हिरोशिमा और नागासाकी में काली बारिश दर्ज की गई थी। उस समय वातावरण में राख, रेडियोधर्मी कण और धुएँ के कारण बारिश का रंग काला हो गया था।
कुवैत तेल आग (1991)
खाड़ी युद्ध के दौरान इराकी सेना ने कुवैत के सैकड़ों तेल कुओं में आग लगा दी थी। महीनों तक जलती आग से निकले धुएँ के कारण कई स्थानों पर काली और अम्लीय बारिश दर्ज की गई थी।
ऑस्ट्रेलिया और अमेरिका के जंगलों की आग
कुछ बड़े जंगलों की आग के बाद भी कई क्षेत्रों में धुएँ और राख के कारण काली बारिश जैसी घटनाएँ देखी गई हैं।
तेहरान की घटना इसी तरह के पर्यावरणीय प्रभावों की आधुनिक मिसाल बनती जा रही है।
स्वास्थ्य पर क्या खतरे हैं
विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) ने चेतावनी दी है कि इस प्रकार की काली और अम्लीय बारिश मानव स्वास्थ्य के लिए गंभीर खतरा पैदा कर सकती है।
विशेषज्ञों के अनुसार इसके संभावित प्रभावों में शामिल हैं—
-
सांस लेने में परेशानी
-
सिरदर्द और चक्कर
-
त्वचा में जलन
-
आंखों में जलन
-
फेफड़ों को गंभीर नुकसान
लंबे समय तक ऐसे प्रदूषण के संपर्क में रहने से कैंसर का खतरा भी बढ़ सकता है।
ईरान की स्वास्थ्य एजेंसियों ने नागरिकों को सलाह दी है कि वे बारिश के दौरान घरों के अंदर रहें और बाहरी गतिविधियों को सीमित करें।
तेहरान की भौगोलिक स्थिति से बढ़ा खतरा
तेहरान की भौगोलिक स्थिति भी इस समस्या को गंभीर बनाती है। शहर चारों ओर पहाड़ों से घिरा हुआ है, जिसके कारण हवा का प्रवाह सीमित रहता है।
इस वजह से प्रदूषक कण लंबे समय तक वातावरण में बने रहते हैं और जमीन की ओर वापस लौटते रहते हैं। विशेषज्ञों के अनुसार यही कारण है कि तेहरान पहले से ही वायु प्रदूषण की समस्या से जूझता रहा है।
‘फॉरएवर केमिकल्स’ का नया खतरा
वैज्ञानिकों ने एक और गंभीर खतरे की चेतावनी दी है जिसे “फॉरएवर केमिकल्स” कहा जाता है।
ये ऐसे रसायन होते हैं जो पर्यावरण में बहुत लंबे समय तक बने रहते हैं और आसानी से नष्ट नहीं होते। माना जा रहा है कि तेल और औद्योगिक संयंत्रों में इस्तेमाल होने वाले कई रसायन इस श्रेणी में आते हैं।
यदि ये रसायन बारिश के माध्यम से जमीन और पानी में पहुंचते हैं तो—
-
भूजल प्रदूषित हो सकता है
-
खेती और खाद्य श्रृंखला प्रभावित हो सकती है
-
मनुष्यों और जानवरों के शरीर में विषैले तत्व जमा हो सकते हैं
पर्यावरण पर दीर्घकालिक प्रभाव
विशेषज्ञों के अनुसार इस प्रकार की घटनाओं के दीर्घकालिक प्रभाव भी हो सकते हैं, जैसे—
-
मिट्टी की गुणवत्ता खराब होना
-
पेड़-पौधों को नुकसान
-
इमारतों और धातु संरचनाओं का तेज़ क्षरण
-
जल स्रोतों का प्रदूषण
ईरान के पर्यावरण संगठनों के अनुसार संघर्ष शुरू होने के बाद से अब तक 200 से अधिक पर्यावरणीय जोखिम वाली घटनाएं दर्ज की जा चुकी हैं।
क्या अंतरराष्ट्रीय कानून पर्याप्त हैं?
अंतरराष्ट्रीय मानवीय कानून (International Humanitarian Law) युद्ध के दौरान नागरिकों और पर्यावरण की रक्षा के लिए कुछ नियम निर्धारित करता है।
हालांकि कई विशेषज्ञों का मानना है कि पर्यावरणीय सुरक्षा के मामले में ये नियम अभी भी पर्याप्त नहीं हैं।
उदाहरण के लिए—
-
औद्योगिक संयंत्रों पर हमलों के पर्यावरणीय प्रभावों के लिए स्पष्ट वैश्विक नियम नहीं हैं
-
युद्ध के दौरान पर्यावरणीय नुकसान का आकलन अक्सर देर से होता है
-
जिम्मेदारी तय करना भी कठिन होता है
तेहरान की घटना इस बहस को फिर से तेज कर सकती है।
युद्ध और पर्यावरण: एक बड़ा सवाल
तेहरान की काली बारिश ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि आधुनिक युद्ध केवल सैन्य संघर्ष नहीं होते, बल्कि उनका असर लंबे समय तक पर्यावरण और मानव स्वास्थ्य पर भी पड़ता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि तेल भंडारण, रासायनिक संयंत्र और औद्योगिक ढांचे युद्ध के दौरान निशाना बनते रहे, तो ऐसे पर्यावरणीय संकट भविष्य में और बढ़ सकते हैं।
